
डॉ. राजीव गुप्ता, आरयूएचएस जर्नल ऑफ हेल्थ साइंसेज के संपादक- भारत सहित अधिकांश निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देश आज बीमारियों के दोहरे भार का सामना कर रहे हैं। एक ओर टीबी, मलेरिया, एचआइवी, हैजा जैसी संक्रामक बीमारियां अब भी जानलेवा हैं, वहीं दूसरी ओर हृदयाघात, स्ट्रोक, कैंसर जैसी असंक्रामक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ये दोनों ही प्रकार की बीमारियां व्यक्ति, परिवार, स्वास्थ्य प्रणाली और पूरे समाज पर भारी आर्थिक बोझ डालती हैं। दोनों का सर्वाधिक प्रभाव गरीबों पर पड़ता है और दोनों को हम रोक भी सकते हैं। लेकिन दोनों प्रकार की बीमारियों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। संक्रामक रोग जहां दूषित पानी, अस्वच्छ भोजन और प्रदूषित हवा के माध्यम से फैलते हैं, वहीं स्ट्रोक, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों के प्रसार के पीछे बड़ा कारण हानिकारक उत्पादों की कम कीमतें, उनका आक्रामक प्रचार-प्रसार और उनकी आसान उपलब्धता है। जब कंपनियां अस्वास्थ्यकर उत्पादों को सस्ता बनाती हैं और बच्चों को ध्यान में रखकर आक्रामक प्रचार के साथ उन्हें बाजार में उतारती हैं तो बीमारियां उसी तरह फैलती हैं, जैसे दूषित पानी से हैजा।
यही कारण है कि संक्रामक रोगों की तुलना में असंक्रामक रोगों पर नियंत्रण पाना कहीं अधिक कठिन हो गया है। तंबाकू, शराब, मीठे पेय पदार्थों, पैकेटबंद खाद्यों और देशी-विदेशी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फास्ट फूड पर लगाए जाने वाले कर को 'हेल्थ टैक्स' कहा जाता है। असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए यह सबसे प्रभावी उपाय है। इसके एक साथ तीन बड़े लाभ हैं- यह अनमोल जीवन बचाता है, स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को कम करता है और सरकार के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाता है, जिसका उपयोग जनकल्याणकारी कार्यों में किया जा सकता है। सीमित संसाधनों वाले देशों में यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध होती है। भारत में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज और स्वास्थ्य बीमा मॉडल लागू होने के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों को यह एहसास हो रहा है कि इन जीर्ण असंक्रामक बीमारियों का आर्थिक बोझ कितना बड़ा है। यह साबित हो चुका है कि तंबाकू पर कर बढ़ाने से इसके सेवन में कमी आती है। भारत में सिगरेट पर भारी टैक्स है, जिससे इसकी खपत घटी है, लेकिन बीड़ी और अन्य तंबाकू उत्पादों पर अब भी पर्याप्त कर नहीं हैं। इस स्थिति को बदलना होगा। इसी तरह, शराब पर भारी कर से इसका सेवन घटाया जा सकता है। शराब केवल लिवर की बीमारी ही नहीं पैदा करती, बल्कि यह कैंसर, हृदयाघात, घरेलू हिंसा और सड़क दुर्घटनाओं का भी बड़ा कारण है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मीठे पेय पदार्थ, अधिक वसा, चीनी व नमक युक्त भोजन के बढ़ते चलन ने भारत में मोटापे को भी एक महामारी बना दिया है, जो मधुमेह, हृदय रोग और अन्य रोगों को जन्म देता है। यूरोप और अमरीका के कई राज्यों में लागू 'शुगर टैक्स' के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए सितंबर 2025 में कार्बोनेटेड और एनर्जी ड्रिंक्स पर जीएसटी बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया है और इन्हें हानिकारक उत्पाद की श्रेणी में रखा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर उच्चतम जीएसटी स्लैब और अतिरिक्त सरचार्ज लगाने की सिफारिश की गई है।
कुछ कंपनियां यह दावा करती हैं कि ये उत्पाद स्थानीय संस्कृति का हिस्सा हैं। लेकिन किसी भी संस्कृति में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा कर कंपनियों के मुनाफे को बढ़ावा देना या बच्चों को तंबाकू और शराब की ओर धकेलना स्वीकार्य नहीं हो सकता। हमारा लक्ष्य हेल्थ टैक्स को एक ऐसी राजनीतिक प्राथमिकता बनाना होना चाहिए जिसे कोई भी नजरअंदाज न कर सके। यह कर केवल राजस्व का जरिया नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के बेहतर स्वास्थ्य का बीमा है।
Updated on:
15 Apr 2026 04:52 pm
Published on:
15 Apr 2026 04:51 pm
