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संपादकीय: अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे की हो तय सीमा

यदि इन पदों को शीघ्रता से भरा जाए, तो निचले स्तर पर ही मामलों का निपटारा तेजी से हो सकेगा और उच्च अदालतों पर दबाव भी कम होगा।
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May 07, 2026
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केंद्रीय कैबिनेट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का निर्णय न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम कहा जाएगा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) सहित जजों की कुल संख्या 33 से बढ़ाकर 38 किए जाने से लंबे समय से लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। देश की सर्वोच्च अदालत में हजारों मुकदमे लंबित हैं, जिनकी समय पर सुनवाई और निपटारा न्याय की मूल भावना के लिए आवश्यक है। पिछले साल के अंत में ही लोकसभा में सरकार ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट व राज्यों के उच्च न्यायालयों में दस साल से ज्यादा अवधि के मामले भी बड़ी संख्या में लंबित चल रहे हैं।

भारतीय न्याय प्रणाली लंबे समय से न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना जैसी आलोचनाओं का सामना करती रही है। अदालतों में बढ़ते मामलों का दबाव न केवल जजों पर अतिरिक्त बोझ डालता है, बल्कि इससे आम नागरिकों को भी वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह बात भी सही है कि केवल सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। देश की न्याय व्यवस्था की जड़ें निचली अदालतों में हैं, जहां सबसे अधिक मामले लंबित रहते हैं। जिला और अधीनस्थ अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के पद खाली हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। यदि इन पदों को शीघ्रता से भरा जाए, तो निचले स्तर पर ही मामलों का निपटारा तेजी से हो सकेगा और उच्च अदालतों पर दबाव भी कम होगा। इसके अलावा न्यायिक व्यवस्था में तकनीक का समुचित उपयोग भी समय की मांग है। ई-कोर्ट, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल फाइलिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल न्याय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और सुलभ बना सकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान वर्चुअल कोर्ट की सफलता ने यह साबित किया है कि तकनीक न्याय प्रणाली को आधुनिक और सक्षम बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो सीधे तौर पर नागरिकों के अधिकारों और विश्वास से जुड़ा हुआ है। न्यायपालिका में सुधार के लिए सरकार, न्यायालय और संबंधित संस्थाओं को मिलकर समन्वित प्रयास करने होंगे। इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाएं ही नहीं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है।

न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल व कम जटिल बनाने की दिशा में भी ठोस प्रयास करने होंगे। सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का निर्णय स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे व्यापक न्यायिक सुधारों की दिशा में एक शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि निचली अदालतों में रिक्त पदों को भरा जाए और तकनीकी सुधारों को तेजी से लागू किया जाए, तो देश की अदालतों और जजों का बोझ कम हो सकता हे।

Updated on:
07 May 2026 02:45 pm
Published on:
07 May 2026 02:45 pm