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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख : पलटीमारों का बहिष्कार हो

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में दल-बदल और निर्दलीय पार्षदों की 'पलटी' पर सवाल उठाए गए हैं। बहुमत न होने के बावजूद कई दलों ने बोर्ड बनाए। लेख में स्थानीय निकायों में भी दल-बदल विरोधी कानून लागू करने और अवसरवादी पार्षदों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही गई है।
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bhuwanesh jain deputy editor patrika group

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख : पलटीमारों का बहिष्कार हो

पुरानी कहावत है 'युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है।' ऐसी कहावतें वे लोग गढ़ते हैं, जो अपने धर्म और न्याय-विरुद्ध तरीकों को सामाजिक मान्यता दिलाना चाहते हैं। हमारे सत्तालोलुप राजनेताओं ने इस कहावत को और भी नया रूप दे दिया। वे कहने लगे 'युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज है।' अर्थ यह हुआ कि आपको सत्ता हासिल करनी है तो कोई भी रास्ता अपना सकते हैं, चाहे वह कितना भी अधर्मपूर्ण, अन्यायपूर्ण और नाजायज हो।

लोकतंत्र के इस 'पाठ' में अब राजनीति के प्रशिक्षु वार्ड और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनावों में ही पारंगत होने लगे हैं। राजस्थान में चल रही स्थानीय निकाय चुनाव प्रक्रिया के दौरान ऐसे सैकड़ों उदाहरण सामने आ चुके हैं। मतदाता अपने पार्षद उम्मीदवार को जिस पार्टी के विरोध में जिताता है, चुनाव जीतने के बाद वही जीता हुआ प्रत्याशी उसी पार्टी के पाले में चरणों में लौटता दिखाई देता है। अपने मतदाताओं के विश्वास को नीलाम करने में वह दस दिन भी नहीं लगाता।

देश के अस्सी साल के लोकतंत्र में संसद और विधानसभाओं के चुनाव के दौरान हम पचासों बार अपने जनप्रतिनिधियों की ऐसी ही उछल-कूद के साक्षी रहे हैं। इसी पर अंकुश लगाने के लिए दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया, पर येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने के रास्ते निकाले जाते रहे हैं। स्थानीय निकायों और पंचायतों में ऐसा कोई कानूनी अंकुश नहीं है, इसीलिए मतदाताओं के साथ विश्वासघात करने की पूरी छूट है।

राजस्थान में हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में बोर्ड निर्माण प्रक्रिया और उसके परिणामों पर नजर डालें तो भाजपा के पास 86 निकायों में ही बहुमत था, पर उसने बोर्ड बनाया 202 निकायों में। कांग्रेस के पास 46 निकायों में बहुमत था। उसने बोर्ड बनाए 97 निकायों में। दूसरी ओर, 32 निकायों में निर्दलीयों को बहुमत था, लेकिन उनके बोर्ड बने केवल सात में। अंदाजा लगा सकते हैं, कितने प्रत्याशियों ने 'पलटी' मार ली। हमारी पार्टियां पहले से ही साम, दाम, दंड, भेद में माहिर हैं। अब उनके शब्दकोश में 'हॉर्स ट्रेडिंग', 'खरीद-फरोख्त', 'बाड़ेबंदी', 'अपहरण' जैसे शब्द जुड़ते जा रहे हैं।

चुनाव में यह आम तौर पर होता है कि टिकट नहीं मिलने पर बहुत से प्रत्याशी बगावत कर निर्दलीय तौर पर चुनाव में खड़े हो जाते हैं। पार्टियों की ओर से उन्हें 'गद्दार' जैसी उपाधियों से नवाजा जाता है। पर वे चुनाव जीत जाते हैं तो कहा-सुना माफ। ससम्मान घर वापसी हो जाती है। अपमानित होता है तो बेचारा मतदाता। वह हाथ मलता रह जाता है। चुनाव जीतने वाले बागी प्रत्याशियों को मुंह मांगी कीमतें मिल जाती हैं, फिर चाहे जनता जाए भाड़ में। ऐसा ही बहुत से निर्दलीय प्रत्याशी करते हैं। पार्टियों के अधिकृत प्रत्याशियों को हराकर जनता उन्हें जिताती है। पर उसी जनता को धोखा देने में ये तनिक देरी नहीं करते।

क्या दल-बदल विरोधी कानून का विस्तार स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों तक नहीं किया जाना चाहिए? क्या छोटे चुनावों में जनता की भावनाओं से खिलवाड़ की छूट दी जानी चाहिए? कानून बने या न बने, जनता चाहे तो अपना कानून बना सकती है। उनका भरोसा तोड़ने वाले ऐसे अवसरवादी पार्षदों का 'सामाजिक बहिष्कार' करना होगा। तभी राजनीति की इस पहली कक्षा में शुचिता, चरित्र और विश्वास जैसे मूल्यों की प्रतिष्ठा हो सकेगी। इस दीमक का सफाया नहीं किया गया तो लोकतांत्रिक मूल्यों को ढहने में देर नहीं लगेगी।