
हमारे लोकतंत्र में सदैव संवाद को प्राथमिकता दी जाती रही है। यह सच भी है कि बातचीत से ही हर समस्या का समाधान किया जा सकता है। राजधानी दिल्ली में सोमवार को जंतर-मंतर से संसद भवन तक जो घटनाक्रम हुआ, उसे संवाद के माध्यम से भी टाला जा सकता था। प्रदर्शन के नाम पर बैरिकेड तोडऩा, पुलिस से टकराव और मेट्रो स्टेशन पर जबरन घुसने जैसे प्रयास व इन्हें रोकने के लिए पुलिस द्वारा हल्का लाठीचार्ज व आंसूगैस के इस्तेमाल तक की नौबत आने को लोकतंत्र की गरिमा के अनुकूल कतई नहीं कहा जा सकता। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया। बीते कई दिनों से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का धरना जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण चल रहा था।
लोकतंत्र में प्रदर्शन, अनशन और घेराव आंदोलन का हिस्सा रहते आए हैं। संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता भी है। लेकिन जुलूस व प्रदर्शन के लिए पुलिस प्रशासन की अनुमति भी लेनी होती है। परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस को यह अनुमति देने या न देने का अधिकार भी है। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि बिना अनुमति जुटाई गई भीड़ का मकसद आवाज उठाने से ज्यादा टकराव पैदा करने के लिए था। कोई दल हो या संगठन, सड़क पर हिंसा भड़काना तो कतई उचित नहीं कहा जा सकता। अन्ना हजारे के वर्ष 2011 के आंदोलन से भी सीख लेने की जरूरत है, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता को न केवल एकजुट किया बल्कि सरकार से संवाद का रास्ता भी खोला। आज इस घटनाक्रम के बीच ही प्रदर्शनकारियों की केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से बात हुई है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। बातचीत का यह दौर जारी रखना चाहिए। सरकार और प्रदर्शनकारियों, दोनों को संवाद की मेज पर बैठना ही चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती प्रदर्शन के अधिकार में है, लेकिन भलाई हिंसा से दूर रहने में भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनकारी और सरकार दोनों जनता के प्रति जवाबदेह हैं। लोकतंत्र में विरोध का सबसे बड़ा हथियार तर्क, संंयम और अहिंसक प्रतिरोध रहता आया है। जिन्होंने भी इसका ध्यान रखा उनके आंदोलन नतीजे लेकर आने वाले रहे हैं।
दिल्ली में इससे पूर्व आंदोलनों के दौरान हुई हिंसक घटनाएं याद दिलाती हैं कि संवाद, समझौता और संवैधानिक तरीकों के जरिए ही बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। संवाद में जरा सी भी चूक आंदोलनों को पटरी से उतार सकती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों पक्ष संवाद की राह चुनने को प्राथमिकता दें। आंदोलनकारियों को भी यह समझना होगा कि हिंसक रास्ते से उनकी बात दब जाती है। सत्ता भी यदि सिर्फ कठोर रवैया ही अपनाने वाली हो तो न केवल आंदोलन की उग्रता होगी बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का संतुलन ही बिगड़ सकता है।