इस शंका का समाधान जरूरी है कि क्या आधार से सरकार को ऐसी शक्ति मिल सकती है जिससे वह जब चाहे नागरिकों की गतिविधियों को नियंत्रित कर सके?
एक अनोखे क्रमांक (यूनीक नंबर) से नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करने की बहुचर्चित आधार परियोजना पर लंबे समय के संशय को समाप्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक मानकर सरकार को राहत दी है। साथ ही डिजिटल सूचनाओं (डेटा) के दुरुपयोग की आशंकाओं को दूर करने के लिए आधार कानून के कई प्रावधानों को अमान्य करार देकर नागरिकों की चिंताएं भी दूर की हैं। कहा जाना चाहिए कि शीर्ष अदालत ने आधार के विचार और आशंकाओं के बीच संतुलन का काम कर दिया है।
सरकार के लिए यह एक संकेत हो सकता है कि संतुलन बनाए रखकर ही आधार के आगे का रास्ता बनाना उचित होगा। इस पहचान संख्या के बहुद्देशीय इस्तेमाल की सरकारी कोशिश को जरूर झटका लगा है जिसमें कालेधन पर नजर रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निगरानी की मंशा शामिल थी। हो सकता है मंशा में खोट न हो लेकिन व्यवस्था तो भविष्य को ध्यान में रख ही बनानी चाहिए।
लोकतंत्र में मनमानी की गुंजाइश नहीं है। यह कोई विडंबना नहीं है कि लोकसभा में बहुमत रखने वाली राजग सरकार राज्यसभा में लगातार अल्पमत में रही। यह लोकतंत्र की खूबी है, जिसने सत्ता पर अंकुश लगाने का काम किया। आधार कानून को धन विधेयक के रूप में लोकसभा से पारित कराने की चालाकी भी काम न आई। धन विधेयक के अंतर्गत आने वाले मामलों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आधार के इस्तेमाल को सीमित कर दिया। सिर्फ सरकारी रियायत वाली योजनाओं, आयकर रिटर्न या निवेश इत्यादि में ही आधार जरूरी माना जाएगा।
निजी कंपनियों को आधार डेटा के रूप में एक बड़ा व्यावसायिक औजार देने का छिपा मकसद बेकार हो गया है लेकिन, जरूरतमंदों तक फायदा पहुंचाने का काम आसान। देखा भी गया है कि सरकारी छूट को सीधे लाभार्थियों के खाते में डालना बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करने या असली लाभार्थियों की पहचान में कारगर रहा है।
आधार मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के फैसलों पर गौर करना यह सुखद अहसास कराने वाला है कि हमारा लोकतंत्र मजबूत हाथों में है। एक स्तंभ की चूक दूसरे स्तंभ की सतर्क निगाहों से बच नहीं पाती। इस मामले में भी कार्यपालिका और विधायिका की गड़बडिय़ों को जिस तरह न्यायपालिका ने सुधारने का काम किया, बेमिसाल है।
संविधान पीठ में बहुमत से असहमति जताने वाले जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के फैसले से पता चलता है कि सरकारें भी कैसे असंवैधानिक काम करती हैं। यूपीए सरकार ने 2009 में आधार परियोजना की नींव रखते समय संसद की अनुमति लेना भी जरूरी नहीं समझा। करीब छह साल तक गैरकानूनी तरीके से नागरिकों की निजी सूचनाएं ली जाती रहीं। इस शंका का समाधान काफी जरूरी है कि क्या आधार की वजह से सरकार को ऐसी असीम शक्ति मिल सकती है जिससे वह जब चाहे नागरिकों की गतिविधियों को नियंत्रित कर सके? उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले समय में जब सरकार आधार कानून को और मजबूती देने के उपाय करेगी, ऐसी शंकाओं का समाधान भी जरूर ही किया जाएगा।