12 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

निजता के बहाने

सामाजिक सोच की हकीकत व निजता के हक के स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं हैं। सामाजिक समझ विकसित करने के लिए भी यह बहस जरूरी है।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Sunil Sharma

Sep 29, 2018

opinion,work and life,rajasthan patrika article,supreme court, supreme court of india

supreme court of india

सुप्रीम कोर्ट का हर फैसला तार्किकता के नायाब उदाहरण समेटे होता है। लेकिन कुछ विषय ऐसे हैं, जिन पर बहस थमने का नाम नहीं लेती। धर्म, कानून और संविधान से जुड़ी एक विवेचना शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की स्त्री को प्रवेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ आई। लेकिन पांच सदस्यीय वृहद पीठ में एकमात्र महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने स्त्रियों के हक में बहुमत से दिये गए इस निर्णय से इत्तेफाक नहीं रखा। उनका मानना है कि संवैधानिक नैतिकता और समानता के अधिकार, धार्मिक आस्था से ऊपर नहीं हो सकते।

इससे पूर्व गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने जब आदेश दिया कि 1994 के इस्माइल फारुकी के निर्णय को वृहद पीठ को सौंपने की जरूरत नहीं है, तो जज जस्टिस अब्दुल नजीर इससे रजामंद नहीं थे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने फारुकी के निर्णय को सही ठहराया कि मस्जिद में नमाज पढऩा, इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। जबकि जस्टिस नजीर का मानना था कि जिस तरह ***** मामला संविधान पीठ को सौंपा गया है, उसी तरह धार्मिक आस्था से जुड़ा, नमाज और मस्जिद का मामला भी वृहद पीठ को जाए।

बहरहाल, बहुमत के दोनों फैसलों के बावजूद, अलग-अलग मामलों में जस्टिस नजीर और जस्टिस इंदु की चिंता और तर्कों से देश का बड़ा वर्ग भी सहमत होगा। सैकड़ों वर्षों की थाती समेटे विभिन्न धर्मों के विषय जब अदालतों की दहलीज पर होंगे तो ऐसे विचलन स्वाभाविक हैं। हर धर्म में कई कर्म-कांड पुरुष या महिला के लिए अलग हैं। सबरीमाला मंदिर में अकेले आते रहे पुरुष, जो धार्मिक मान्यता की वजह से मां, पत्नी या बेटी को साथ नहीं लाते होंगे, क्या अब आस्था या परंपरा उन्हें नहीं रोकेगी?

इसमें दोराय नहीं कि सामाजिक व कार्यक्षेत्रों में स्त्री-पुरुष समानता मजबूती से लागू होनी चाहिए, लेकिन क्या धर्म और परंपराएं अदालतों से तय हों? दूसरी ओर, धर्म ही नहीं, विवाह और यौन रुचियों से जुड़े फैसले भी समाज को मथ रहे हैं। समलैंगिक यौन सम्बंधों को अपराध करार देने वाली धारा 377 खारिज करने का फैसला हो या शुक्रवार को ही व्यभिचार पर आया निर्णय, सामाजिक स्वीकार्यता फिर बड़ी चुनौती है।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 भले ही खत्म कर दी हो, लेकिन भारतीय समाज, विवाहित स्त्री या पुरुष के किसी अन्य से शारीरिक संबंध को यौन-रुचि की निजता का अधिकार जैसी उदारता के साथ नहीं सोचता। जैसे समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध न मानने के मायने प्रगतिशील समाज का एक विशिष्ट वर्ग ही समझ सकता है। वैश्विक सोच लेकिन संस्कारी भारत की चाहत वाले वृहद समाज को निजता के अधिकार के ये स्वरूप कैसे समझाये जाएंगे? ऐसे कितने परिवार होंगे, जो अपने पुत्र या पुत्री के समलैंगिक सम्बंध को उसकी यौन रुचि का अधिकार मानेंगे, विकार नहीं? सामाजिक सोच की हकीकत व निजता के हक के स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं हैं। सामाजिक समझ विकसित करने के लिए भी यह बहस जरूरी है।