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मालदीव पर टिकी निगाहें

मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी गठबंधन के साझा उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने अब्दुल्ला यामीन के मुकाबले लगभग 16.6 प्रतिशत अधिक मत हासिल किए।

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जयपुर

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Sunil Sharma

Sep 29, 2018

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- शोभना जैन, वरिष्ठ पत्रकार

मालदीव के हाल के राष्ट्रपति चुनाव में देश की जनता ने राजनीतिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के दमन चक्र के बीच तानाशाह राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन का तख्ता पलट दिया। चुनाव में धांधली की तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए लगभग 90 प्रतिशत मतदान हुआ। अपने ‘खासमखास’ के तख्ता पलट और मालदीव में अपनी बढ़ती पैठ और चौधराहट पर छाई काली छाया से एक ओर जहां चीन हतप्रभ और बेचैन है, वहीं भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मालदीव में लोकतंत्र की बयार के फिर से बहने का स्वागत किया है।

भारत के लिए मालदीव में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम होने के खास मायने हैं। चीन के लिए ‘बेहद खास’ हो चुके यामीन दरअसल पिछले कुछ वर्षों से लगातार ‘धुर भारत विरोधी’ रवैया अपनाए हुए थे। इस चुनाव से पूर्व देश में आपातकाल लागू करने और सभी प्रमुख नेताओं और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को जेल में ठूंसे जाने पर भारत के मुखर विरोध के बाद तो यामीन के लिए भारत आंख की किरकिरी ही बन गया था। मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए कभी भारत को ‘अव्वल’ स्थान देने वाले मालदीव ने यामीन के दौर में तल्ख दूरी बना ली थी।

जाहिर है मालदीव के चीन की तरफ गहरे झुकाव या यों कहे चीन को मालदीव क्षेत्र में पूरी पैठ बनाने देने का भारत सहित हिंद महासागर क्षेत्र पर भी असर पड़ा। उम्मीद है कि नई सरकार के आने से भारत व मालदीव के बीच द्विपक्षीय सहयोग बढ़ेगा, लेकिन यह भी तय है कि भारत इस बार अपने इस पुराने परंपरागत मित्र के साथ रिश्ते बढ़ाने में पूरी सतर्कता रखेगा। परस्पर भरोसे की पूंजी के साथ उसे सावधानी से आगे बढऩा होगा।

इस चुनाव में विपक्षी गठबंधन के साझा उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने अब्दुल्ला यामीन के मुकाबले लगभग 16.6 प्रतिशत अधिक मत हासिल कर जीत दर्ज की। अभी ये नतीजे अंतरिम हैं तथा अगले सप्ताह अंतिम चुनाव परिणाम घोषित किए जाने की उम्मीद है। दिलचस्प बात यह है कि चुनाव नतीजे स्वीकार किए जाने और सत्ता हस्तातंरण को लेकर यामीन की पिछली दमनकारी कार्यप्रणाली को देखते हुए तमाम तरह की आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं।

यामीन ने चुनाव के दौरान भी गड़बड़ी करने और विपक्ष को डराने-धमकाने के हर संभव पैंतरे अपनाए। चुनाव आयोग के अनुसार १७ नवंबर को नई सरकार के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम निर्धारित है। विश्व समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्वक होगा या नहीं।
भारत, अमरीका, संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व समुदाय ने मालदीव की संसद और न्यायपालिका जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्वतंत्र तथा निष्पक्ष तरीके से काम करने का अवसर दिए बिना चुनावों के ऐलान पर चिंता जताई थी। बहरहाल चुनाव परिणाम आ चुके हैं। वहां ऐसी सरकार निर्वाचित हुई है जो भारत को मित्र मानती है और उसके साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने की पक्षधर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी अब मालदीव के साथ द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने का एजेंडा लेकर जल्द मालदीव जाने की उम्मीद है। समझा जाता है कि मोदी मार्च 2015 में वहां जाने वाले थे, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद की गिरफ्तारी के बाद अस्थिरता की वजह से उन्होंने वहां जाना स्थगित कर दिया था। एक वरिष्ठ पूर्व राजनयिक के अनुसार, हो सकता है कि प्रधानमंत्री नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में मालदीव जाएं।

भारत समर्थक रहे पूर्व राष्ट्रपति नशीद पर आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगा कर तेरह साल कैद की सजा सुनाई गई, जिससे वह चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य हो गए। इसी के बाद सोलिह को विपक्ष का साझा उम्मीदवार घोषित किया गया। उम्मीद है कि सोलिह सरकार में नशीद की भूमिका अहम रहेगी। नशीद ने चुनाव नतीजे आने के बाद ऐलान किया कि मालदीव में चल रही चीन की आधारभूत परियोजनाओं की समीक्षा कराई जाएगी।

चीन मालदीव सहित सेशल्स, नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों में मदद और कर्ज के नाम पर अपना जाल बिछा रहा है। मालदीव में चीन की कंपनियों ने आधारभूत ढांचा विकसित करने के नाम पर बड़े ठेके हासिल किए। मालदीव की बाहरी मदद का 70 फीसदी हिस्सा अकेले चीन देता है, जो वहां अपना सैन्य ठिकाना बनाने की फिराक में है। चीन के मालदीव से गहरे सामरिक हित जुड़े हैं और अपने विस्तारवादी मंसूबों के लिए वह मालदीव का इस्तेमाल कर रहा है। मालदीव के सात द्वीपों पर चीन गहरी पैठ बना भी चुका है।

मालदीव में जारी राजनीतिक अस्थिरता का हिंद महासागर क्षेत्र और विशेषकर भारत पर प्रतिकूल असर पड़ा है, इसलिए वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली क्षेत्र की शांति और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह क्षेत्र के सभी देशों के साथ सहयोग और विकास की साझा परियोजनाओं को लागू करने में चीन की रफ्तार को मात दे। उम्मीद की जानी चाहिए कि जैसे मालदीव ने चीन के विस्तारवादी रवैये और उनके अनुसरणकर्ता अब्दुल्ला यामीन को आईना दिखाया है, उसी तरह वह पुराने सहयोगी भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित भी करेगा।