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लचीलापन क्यों?

इस बार के चुनाव कुछ विशेष होंगे। सत्ताधीशों के लिए तो जनता खिलौना मात्र है। किन्तु जनता बेचैन है, त्रस्त है। नए परिवेश में देश तीन मुख्य धड़ों में बंट चुका है।

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सम्पूर्ण देश आज एक झंझावत से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, संवैधानिक आदि सभी व्यवस्थाओं में मानो एक भूचाल आया हुआ है। देश अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। आने वाले चुनावों की अमर्यादित उखाड़-पछाड़ के बीच, भ्रष्टाचार, मुद्रा-महंगाई और बेरोजगारी के तीर चल रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। सरकार की चारों ओर किरकिरी हो रही है। केन्द्र, विशेषकर प्रधानमंत्री, मौन हैं।

इस बार के चुनाव कुछ विशेष होंगे। सत्ताधीशों के लिए तो जनता खिलौना मात्र है। किन्तु जनता बेचैन है, त्रस्त है। नए परिवेश में देश तीन मुख्य धड़ों में बंट चुका है। कानून की भी इस विभाजन पर मोहर लग चुकी है। मुस्लिम इस बार अधिक संगठित हो गया है। यह भी चिन्ता का एक बड़ा राजनीतिक कारण बना हुआ है, विशेषकर भाजपा के लिए। वैसे भी तीन बड़े प्रान्तों का चुनाव भाजपा के विरोध में ही लड़ा जाना है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा १५-१५ वर्षों से सत्ता में है। डर कहां है?

इस बार अजा-जजा एक्ट ने शेष भारत के भी बराबर के दो टुकड़े कर दिए। यह भी भाजपा और कांग्रेस दोनों की सहमति से हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप सवर्ण समुदाय पहली बार आक्रामक हो गया। आरक्षण तो पहले भी था। आक्रोश ऐसा नहीं था। मुसलमानों को जब अल्पसंख्यक घोषित किया था, तब भी प्रतिक्रिया हुई थी। आज परिणाम सामने हैं। ठीक ऐसे ही परिणाम अजा-जजा एक्ट के कारण भी आ सकते हैं। भाजपा अब चारों ओर उठने वाली प्रतिक्रिया से घबरा गई है। हर एक एजेन्सी एक ही परिणाम की ओर इंगित कर रही है। भाजपा के लिए गरीबी में आटा गीला हो गया। न कुछ आश्वासन दे सकती, न ही किए को अनकिया कर सकती। तब बीच का रास्ता निकाला गया।

भाजपा के पास एक धारदार हथियार है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ प्रमुख मोहन भागवत अश्वमेध यज्ञ की यात्रा पर निकले हुए हैं। जिस तरह की लचीली भाषा का वे प्रयोग कर रहे हैं, वह कितनी प्रभावकारी हो पाएगी, यह तो समय ही तय करेगा। मूल में तो भाजपा संघ की एक शाखा है। आज भागवत जी के बयानों से लगता कुछ और ही है। यहां तक कि संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा, संविधान का सान्निध्य, पूरे गांव का एक कुआं, एक मन्दिर की बात, एक श्मशान की बात कह तो रहे हैं, किन्तु आरक्षण की कड़वाहट में कोई कैसे सुनेगा, वे यह भी जानते हैं। वे कह चुके हैं कि वे राम मन्दिर निर्माण के पूर्णत: हिमायती हैं और आरक्षण के भी। दोनों बातें साथ बैठती दिखाई नहीं देती।

आज देश-विदेश में लिंचिंग को लेकर भाजपा सरकारों की खूब किरकिरी हुई है। गौ-हत्या के नाम पर हत्याओं के लिए पहले ही बदनाम रही है। ऐसी स्थिति में संघ प्रमुख का यह बयान कि ‘जिस दिन हम कहेंगे कि हमें मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन हिन्दुत्व नहीं रहेगा’ कितना कारगर होगा? पिछले वर्षों में संघ की हिन्दुत्व की परिभाषा ने भी करवटें बदली हैं। आज जब भाजपा मुस्लिम विरोधी वातावरण बनाने के लिए बदनाम है, तब मोहन भागवत का बयान उन्हें शान्त करता दिखाई नहीं पड़ता। आग लगने पर कुआं खोदा जा रहा है। इस बयान को ‘अनेकता में एकता’ का प्रयास तो नहीं कह सकते। यह भी एक कटु सत्य है कि संघ का ही एक घटक मुसलमानों के सख्त खिलाफ है।

हम एक ओर कह रहे हैं कि सभी देशवासी हिन्दू हैं और दूसरी तरफ भागवत का आह्वान है कि ‘लालच में जो दूर चले गए, उन्हें वापिस लाओ।’ तब संविधान के अनुसार सभी धर्मों की रक्षा की बात कैसे मानी जाए? संविधान धर्मनिरपेक्ष है। आज बहाना हिन्दू-मुस्लिम के बीच संतुलन का है। हम ही वोटों के लिए देश के टुकड़े करते हैं, देश में आग लगाते हैं। सब मौन रहकर देखते हैं। यही हाल कुछ ही वर्षों में अजा-जजा और सवर्णों के मध्य होने वाला है, जिसके आज भागवत पक्षधर हैं। कल संतुलन संघ भी नहीं कर पाएगा। भाजपा की जमीन आज ही खिसकती जान पड़ रही है, कल क्या होगा? न एक कुआं काम आएगा, न एक मन्दिर। अल्पसंख्यकों के पास हुनर है, बच गए। इनके पास तो वह भी नहीं है।

संघ विश्व का बृहद्तम संगठन है। इसे राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी नीति इतनी लचीली नहीं बना लेनी चाहिए, मानो राजनीति के निर्णयों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रही हो। संघ को तो निर्णय लेने से पूर्व सरकार को भावी आशंकाओं से अवगत कराना चाहिए। निर्णय होने पर उनका समर्थन भी करना पड़े और नई परिस्थितियों का भय भी बना रहे, यह देश के हित में नहीं होगा, न ही संघ के हित में होगा। भाजपा की हां में हां मिलाने के स्थान पर एक पितृ-संस्था की तरह आदेशात्मक रवैया बना रहना चाहिए। इसके बिना देश को पितृभूमि और मातृभूमि का पाठ पढ़ाना काम नहीं आएगा।

हिन्दू धर्म नहीं, जीवन पद्धति है। देश का हर नागरिक हिन्दू है। यह सब बातें कहने मात्र की नहीं हैं। जब किसी भी समुदाय पर अन्याय होता है, तब सहायता के लिए संघ को ही अगली कतार में दिखाई देना चाहिए। कथनी और करणी तब शिरोधार्य होगी।