
school kids
- प्रेमपाल शर्मा, लेखक व प्रशासक
खबर सुनने में तो अच्छी है कि कर्नाटक सरकार अपने कर्मचारियों को केवल सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का फरमान जारी करने वाली है। यह साल भर पहले उस समिति की सिफारिशों के आधार पर किया जाने वाला है जिसमें सरकारी स्कूलों को सुधारने का सबसे मजबूत उपाय बताया गया था कि जो कर्मचारी सरकारी खजाने से तनख्वाह लेते हैं उन्हें अपने बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ाने होंगे। ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान किए जाए।
ऐसी खबर अनोखी नहीं है। वर्ष २०१५ में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के सरकारी स्कूलों की बदहाली को लेकर आदेश दिया था कि न केवल सरकारी कर्मचारी बल्कि विधायक, बैंक आदि उपक्रमों के कार्मिकों को भी अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाने होंगे। आज तक उस आदेश को लागू करने के लिए किसी भी दल, मंच की तरफ से सुगबुगाहट तक नहीं हुई। वर्ष 2015 में यूपी में अखिलेश सरकार थी। न तब और न ही अब योगी आदित्यनाथ सरकार ने इसे लागू करने में दिलचस्पी दिखाई। क्या यह कोर्ट, संविधान का अपमान नहीं? क्या आरक्षण और दूसरे मसलों पर ईंट से ईंट बजाने वालों को नहीं पता कि संविधान में समान और अपनी भाषाओं में शिक्षा देने की बात कही गई है और कई न्यायालयों के निर्णय भी इस पक्ष में रहे हैं।
शिक्षा के बूते ही समानता की बात दुनिया भर में फैली है। और, समानता के गर्भ से पैदा हुआ है लोकतंत्र। लेकिन जब लोकतंत्र के नाम पर बनी सरकारें ही असमान शिक्षा की पैरवी करें तो लोक का डूबना तय है। तीस वर्ष पहले जहां नब्बे प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ रहे थे, आज पचास प्रतिशत भी नहीं हैं।
ऐसा नहीं है कि राजनेता इससे अनभिज्ञ हैं लेकिन शिक्षा को कमाई का जरिया मानने वाली ताकतों का इतना दबाव है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश से लेकर देश भर की सरकारें हजारों स्कूलों को बंद कर चुकी हैं। ब्रिटिश विरासत की भारतीय रेलवे के चार सौ से ज्यादा स्कूल थे। अब मुश्किल से सौ बचे हैं। उन्हें भी बंद करने की साजिश चल रही है।
इसलिए कर्नाटक सरकार की बातों पर यकीन नहीं हो पाता। कर्नाटक की देखा-देखी उत्तरप्रदेश की सरकार ने भी ऐसा ही शिगूफा छोड़ा है। हो सकता है यह जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश हो। लेकिन गांधी को याद करें तो समानता के हक की भूखी जनता, सत्ता को ऐसा करने को मजबूर कर सकती है। लेकिन क्या जनता में भी समानता का कोई भाव बचा है?

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