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जहर जैसी हवा, फिर भी फेफड़ों की पढ़ाई ‘ऑप्शनल’!

रेस्पिरेटरी मेडिसिन वही प्रशिक्षण है जहां डॉक्टर सीखते हैं कि अस्थमा हो, टीबी हो या अचानक सांस फिसल जाए तो मरीज को तुरंत कैसे संभालना है। एमबीबीएस की यही बुनियादी ट्रेनिंग डॉक्टर को वार्ड, इमरजेंसी और ग्रामीण अस्पतालों के लिए तैयार करती है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 20, 2026

-डॉ. अश्वनी पाराशर बाल रोग विशेषज्ञ (पीजीआइ चंडीगढ़)

सर्दियों की सुबह अब पहले जैसी नहीं रहीं-खिड़की खोलते ही हवा में जलन उतर आती है। ओपीडी में रोज यही सवाल सुनाई देता है- 'डॉक्टर साहब, ये खांसी मौसम की है या हवा की?' इस बार की ठंड में हवा बाकायदा दुश्मन बन गई। कई शहर 400 से ऊपर एक्यूआइ पर अटके रहे। यह धुंध डब्ल्यूएचओ की तय सीमा से कई गुना जहरीली है। 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज' (जीबीडी) के मुताबिक भारत में हर साल लगभग 16-17 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी होती हैं। ऐसे समय में उम्मीद यही होती है कि डॉक्टरों की पढ़ाई में फेफड़ों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। लेकिन ठीक इसी दौर में एक उलटा फैसला हुआ- रेस्पिरेटरी मेडिसिन को एमबीबीएस के अनिवार्य स्वतंत्र विषयों की सूची से हटाकर 'वैकल्पिक' कर दिया गया। रेस्पिरेटरी मेडिसिन वही प्रशिक्षण है, जहां डॉक्टर सीखते हैं कि अस्थमा हो, टीबी हो या अचानक सांस फिसल जाए तो मरीज को तुरंत कैसे संभालना है।

एमबीबीएस की यही बुनियादी ट्रेनिंग डॉक्टर को वार्ड, इमरजेंसी और ग्रामीण अस्पतालों के लिए तैयार करती है। इसलिए इस विषय की मजबूत नींव जरूरी है ताकि डॉक्टर आगे चाहे जिस भी मोड़ पर जाए, मरीज की सांस उसके सामने न अटके। कोविड ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि फेफड़ों की ट्रेनिंग मजबूत होगी, तभी स्वास्थ्य-तंत्र टिकेगा। कई देशों ने पोस्ट-कोविड इमरजेंसी ट्रेनिंग बढ़ाई, नए कोर्स शुरू किए। और हम? हमने उसी समय रिवर्स गियर डाल दिया। कोविड के बाद महीनों की खांसी, सांस फूलना और फेफड़ों का सख्त होना अब ओपीडी की आम तस्वीर है। भारत में हर दो मरीजों में से एक सांस की शिकायत लेकर डॉक्टर के पास आता है। पोसीडॉन जैसे सर्वे बताते हैं कि देश की आधी से ज्यादा ओपीडी सांस से जुड़ी बीमारियों से भरी रहती हैं- अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी और टीबी। बदलता मौसम हालात को और मुश्किल बना रहा है। शहरों में एक्यूआइ 400 है और गांवों में रसोई का धुआं- बीमारी के दो चेहरे। उज्ज्वला योजना ने शुरुआत में राहत दी, लेकिन महंगे सिलेंडर और घटती सब्सिडी ने कई परिवारों को फिर लकड़ी-चूल्हे की ओर धकेल दिया। ऐसे में फेफड़ों की पढ़ाई को वैकल्पिक करना वैसा ही है जैसे मैच शुरू होने से पहले अपनी टीम का गोलकीपर घर भेज देना। जीबीडी के अनुसार, दुनिया के फेफड़ों के रोग-बोझ का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारत में है। अस्थमा के कुल मरीजों में भारत की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत है, लेकिन अस्थमा से होने वाली मौतों में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत से अधिक है। यह सिर्फ बीमारी की नहीं, हमारी ट्रेनिंग और सिस्टम की कमजोरी की कहानी है। एनएमसी का तर्क है कि एमबीबीएस का पाठ्यक्रम पहले से बोझिल है और फेफड़ों की पढ़ाई जनरल मेडिसिन में समेटी जा सकती है। आयोग के मुताबिक विशेषज्ञ प्रशिक्षण स्नातकोत्तर स्तर पर होना चाहिए और 'स्किल-बेस्ड' एकीकृत पढ़ाई पर्याप्त है।

यह दलील सुनने में ठीक लगती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा कड़ी है। हकीकत यह है कि जनरल मेडिसिन पहले ही ओपीडी, वार्ड, आइसीयू, इमरजेंसी और शिक्षण का बोझ उठा रहा है। भारत में 'वैकल्पिक विषय' का मतलब अक्सर होता है- न बजट, न शिक्षक, न ढांचा। यह भी याद रखना जरूरी है कि रेस्पिरेटरी मेडिसिन कोई नई मांग नहीं थी। 1999 से 2020 तक 'टीबी और रेस्पिरेटरी डिजीज' एमबीबीएस का अनिवार्य हिस्सा रहा। 2023 में शिक्षा को 'सरल' बनाने के नाम पर इसे वैकल्पिक किया गया। यानी डॉक्टर की पढ़ाई में सांस हमेशा बीच में रही और अचानक उसे हाशिये पर धकेल दिया गया। टीबी का बोझ पहले से ही भारी है। भारत दुनिया में टीबी के सबसे ज्यादा मरीजों वाला देश है। ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी- यानी वह टीबी जिस पर आम दवाएं बेअसर हो चुकी हों- के इलाज में सिर्फ दवा नहीं, विशेष प्रशिक्षण चाहिए। सरकार ने 2025 तक 'टीबी-मुक्त भारत' का लक्ष्य रखा था, लेकिन जांच, दवाइयों और विशेषज्ञों की कमी जमीनी सच्चाई है। जब पुरानी और जिद्दी बीमारी से लड़ाई ही अधूरी हो, तब फेफड़ों की ट्रेनिंग को कमजोर करना कैसे तर्कसंगत है? इसी चिंता ने इंडियन चेस्ट सोसायटी को बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) तक पहुंचाया। अदालत ने तीखा सवाल पूछा—कोविड के बाद फेफड़ों की ट्रेनिंग कमजोर कैसे की जा सकती है? मामला अभी विचाराधीन है, लेकिन सवाल वाजिब था।

इसकी सबसे बड़ी चोट ग्रामीण भारत पर पड़ेगी, जहां एमबीबीएस ही पूरा सिस्टम है। कुछ दिन पहले ओपीडी में सात साल का एक बच्चा आया, जो रात में खांसी से सो नहीं पाता था। मां बोली- 'दवा तो मिली है, पर लेने का तरीका किसी ने ठीक से बताया नहीं।' सिर्फ सही तकनीक समझाने से उसकी आधी परेशानी कम हो गई। लेकिन यह तभी संभव है, जब डॉक्टरों को पढ़ाई के दौरान ऐसा व्यावहारिक अभ्यास मिले। रेस्पिरेटरी ट्रेनिंग को एमबीबीएस में फिर से मजबूत और अनिवार्य बनाना सिर्फ शैक्षणिक बदलाव नहीं- यह देश की स्वास्थ्य-सुरक्षा की बुनियादी जरूरत है। जब हवा बीमार हो, जब बच्चे खांसते-खांसते सोते हों, जब अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ते जाएं और कोविड के घाव अभी ताजा हों- ऐसे समय फेफड़ों की पढ़ाई को 'विकल्प' बनाना केवल प्रशासनिक भूल नहीं, एक नैतिक चूक है।