एआई तकनीक जहां कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सहायक है, वहीं यह मौलिक सृजन, चिंतन और जीवंतता के क्षरण की आशंका भी पैदा करती है। लेख मानव मस्तिष्क और मशीन के अंतर, प्रतीकधर्मी भारतीय कलाओं की विशिष्टता तथा डिजिटल युग में रचनात्मकता के संकट पर विचार करता है।
डॉ. राजेश कुमार व्यास,
एआइ इंपैक्ट समिट ने वैश्विक स्तर पर हमें अग्रणी करने की दृष्टि से भले ही जोड़ा है, परंतु मौलिक चिंतन और मनन में यह शून्य उपजाने की बहुत-सी आशंकाएं लिए भी है। लुप्त कलाओं की रिकॉर्डिंग अभिलेखीय संरक्षण में इसका बेहतर उपयोग हो सकता है, परंतु सब-कुछ जब मशीन ही करेगी तो मौलिक रचना और उसमें बसने की संभावनाएं क्या तेजी से समाप्त नहीं होंगी! एआइ शून्य से सृजन नहीं करती। मानव मस्तिष्क से पुनर्संरचना और अनुमान पर ही इसका अस्तित्व है। बड़ा संकट यह भी है कि हमने सूचनाओं को ही ज्ञान मानना प्रारंभ कर दिया है। सूचनाएं संस्कृति से जुड़ी दृष्टि तक पहुंच की सुगमता हो सकती है, परंतु कलाओं से जुड़ा विचार नहीं हो सकती। भारतीय कलाएं प्रतिकर्मी हैं।
संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकलाएं आदि सभी में प्रतीकों से सूचनाओं का संप्रेषण होता है। एब्सट्रेक्ट ही नहीं, आदिवासी और जनजातीय कलाओं के संसार में जाएंगे तो पाएंगे, वहां प्रतीकों में, अर्थगर्भित संकेतों में और कहन की भांत-भांत की छटाओं में संसार बुना गया है। एआइ बहुत सारा एकत्र शास्त्रीय संगीत, नृत्य की भंगिमाओं, नाट्य से जुड़ी परंपराओं का एकत्रीकरण कर स्वयंमेव बहुत सारा उससे नया गढ़ देगी परंतु वहां मनुष्य सिरजे की जीवंतता कहां से आएगी! प्रकृति की छटाएं, परिवेश की सुगंध वहां कैसे घुलेगी! जब बहुत सारा संस्कृति से जुड़ा सूचनाओं का ढेर हमारे पास सदा मौजूद रहेगा तो यह भी हो सकता है कि हम कला में नया कुछ रचने की आदत को ही बिसरा दें।
याद रखें, प्रकृति और परिवेश का संतुलन बिगड़ते ही सूचनाओं के स्रोत सूखने लगते हैं। मनुष्य और मशीन में यही बड़ा फर्क है। मनुष्य मस्तिष्क परिवेश और प्रकृति प्रदत्त सूचनाओं को निरंतर ग्रहण करता है, परंतु कहीं ठहरता नहीं है। इसलिए बहुतेरी बार अनपेक्षित अप्रत्याशित कलाओं का सृजन अनायास मनुष्य मन कर देता है। एआइ में कलाओं से जुड़ी सूचनाओं के स्रोत महत्वपूर्ण कारक होते हैं। इनके आधार पर वहां बुद्धिमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता दिखता है, पर यदि सूचनाएं गलत होंगी या अनर्गल होंगी तो सर्वथा विनाश की संभावनाएं भी बनेंगी। मानव मस्तिष्क को पढ़ उससे अपना गढ़ने का गुण तो एआइ ने पा लिया है, परंतु सूचनाओं को संस्कृति मान आगे बढ़ने का जोखिम बढ़ने लगा है।
चिंतन, ठहरकर सोचने की दृष्टि चुपके से हमसे लोप होने लगी है। एकरसता में विविधता सिमट रही है। कलाओं से जुड़ी विरासत का डिजिटलाइजेशन तो हो रहा है, पर संकट यह है कि उसमें जो कुछ हमारे पास मौजूद है, उसे पढ़ने की फुर्सत एक समय में बहुत सारा एक साथ पाने के लालच में क्या मिल पाएगी!