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संपादकीय: ‘पैक्स सिलिका’ से भारत को मिलेगी वैश्विक बढ़त

अमेरिका की पहल ‘पैक्स सिलिका’ से जुड़कर भारत ने एआई और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में वैश्विक साझेदारी मजबूत की है। यह पहल तकनीकी आत्मनिर्भरता, खनिज आपूर्ति सहयोग और चीन के प्रभाव संतुलन की दिशा में अहम कदम है, हालांकि रूस-अमेरिका संतुलन और डेटा सुरक्षा चुनौतियां बनी रहेंगी।

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India US Strategic Partnership

पैक्स सिलिका का उद्देश्य एआइ जैसी आधुनिक व संवेदनशील तकनीक का शत्रुतापूर्ण इस्तेमाल रोकना है।

अमरीका की पहल 'पैक्स सिलिका' पर हस्ताक्षर करके भारत ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत कर लिया है। यह भारत को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने और वैश्विक मंच पर निर्णायक खिलाड़ी के रूप में उभारने का मार्ग प्रशस्त करने वाला है। यह एआइ और सेमीकंडक्टर जैसी भावी तकनीकी जरूरतों के लिए मजबूत इकोसिस्टम बनाने की दिशा में काफी अहम है। व्यापार समझौते पर गतिरोध दूर करने के लिए अमरीका ने भारत को 'पैक्स सिलिका' में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था, जिसे स्वीकार करने में भारत ने कोई कोताही नहीं बरती।

'पैक्स' का अर्थ है शांति और 'सिलिका' आधुनिक कंप्यूटिंग की नींव है। पैक्स सिलिका का उद्देश्य एआइ जैसी आधुनिक व संवेदनशील तकनीक का शत्रुतापूर्ण इस्तेमाल रोकना है। हालांकि, इस अमरीकी पहल का रणनीतिक उद्देश्य चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है। जाहिर है भारत को इससे बाहर रखना किसी भी तरह समझदारी नहीं थी। नई दिल्ली में इंडिया एआइ इंपैक्ट समिट के दौरान सूचना व प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव और अमरीकी आर्थिक मामलों के मंत्री जैकब हेलबर्ग ने 'पैक्स सिलिका' घोषणा पत्र पर औपचारिक मुहर लगाई।

हस्ताक्षर करने वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन, यूएई, सिंगापुर, इजराइल, कतर और ग्रीस शामिल हैं। कनाडा, यूरोपीय संघ, नीदरलैंड्स और ताइवान जैसे देश भी इसमें भागीदार हैं। भारत एआइ और सेमीकंडक्टर मिशन पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है एवं अमरीका और चीन के बाद तीसरी बड़ी शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। एआइ और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के लिए लिथियम, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिज अनिवार्य हैं। जाहिर है जरूरी खनिजों और तकनीक की साझेदारी के बिना भारतीय मिशन को पूरा करना मुश्किल टास्क होता। 'पैक्स सिलिका' में शामिल होने के बाद भारतीय डेटा सेंटरों और क्लाउड कंप्यूटिंग में निवेश बढ़ेगा। यह भारत की वैश्विक छवि को एक 'जिम्मेदार तकनीकी शक्ति' के रूप में स्थापित करता है।

'पैक्स सिलिका' की शर्तें पूरी तरह सामने नहीं आई हैं, इसलिए इसके जोखिमों की स्पष्ट पहचान अभी नहीं की जा सकती, पर रणनीतिक मामलों में अमरीका के ज्यादा करीब आने पर रूस जैसे भरोसेमंद दोस्त से तारतम्य बिगड़ने का जोखिम जरूर है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ भारतीय डेटा को साझा करने के भी अपने खतरे हैं। बढ़ती नजदीकियों के बावजूद भारत अमरीका पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकता, खासकर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर, जो पाकिस्तान जैसे शत्रु देश को गोद में बैठाने के लिए बेताब दिखते हैं व बांग्लादेश जैसे भरोसेमंद पड़ोसी को उकसाने का मौका नहीं छोड़ते। रूस और अमरीका के बीच भारत सरकार किस तरह सामंजस्य बिठाती है- यह देखने वाली बात होगी।