ओपिनियन

संपादकीय: विकास की रफ्तार के साथ जीवन की सहजता जरूरी

पहले आबादी आती है, फिर सड़क, पानी, सीवर, परिवहन और आवास जैसी सुविधाओं की योजना बनाई जाती है। नतीजा यह होता है कि आर्थिक विकास तो दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ अव्यवस्था भी बढ़ती जाती है।
2 min read
Sep 24, 2026
city
city

ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ग्लोबल सिटीज इंडेक्स-2026 में उभरते हुए शहरों की सूची में भारत के 46 शहरों का होना बदलती आर्थिक तस्वीर का संकेत है। लंबे समय तक मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलूरु जैसे महानगर ही देश की शहरी आर्थिक ताकत के प्रतीक रहे हैं। अब जयपुर, भोपाल, उदयपुर और सूरत जैसे शहर भी अपनी आर्थिक पहचान मजबूत कर रहे हैं। मजबूत जीडीपी, बढ़ता श्रमबल, उत्पादकता और आय में वृद्धि इस बदलाव की बुनियाद हैं। वर्ष २०५० तक दिल्ली के दुनिया की 63वीं सबसे बड़ी शहरी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान इसी रफ्तार की तस्वीर पेश करता है।

इस सुनहरी तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि किसी शहर की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है। जरूरत इस बात की भी है कि वहां रहने वाले लोगों का जीवन सहज, सुरक्षित और स्वस्थ रहे। सवाल यही है कि क्या आर्थिक वृद्धि के साथ शहर बेहतर जीवन गुणवत्ता भी दे पाएंगे? भारत के शहरों में आर्थिक गतिविधियां बढऩे के साथ आबादी और संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। प्रदूषण कई शहरों की स्थायी समस्या बन चुका है। भूजल का स्तर गिर रहा है। लोगों के लिए पर्याप्त और किफायती आवास उपलब्ध कराना चुनौती है। सार्वजनिक परिवहन की क्षमता सीमित है, जिससे यातायात का दबाव बढ़ता है। कचरा निस्तारण और सीवेज प्रबंधन की कमजोर व्यवस्थाएं भी शहरों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बोझ डाल रही हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शहरों का विस्तार अक्सर नियोजन की गति से तेज होता है। पहले आबादी आती है, फिर सड़क, पानी, सीवर, परिवहन और आवास जैसी सुविधाओं की योजना बनाई जाती है। नतीजा यह होता है कि आर्थिक विकास तो दिखाई देता है, लेकिन उसके साथ अव्यवस्था भी बढ़ती जाती है। ऐसे में देश को अब 'तेजी से बढ़ते शहर' नहीं, बल्कि 'रहने योग्य शहर' बनाने की दिशा में आगे बढऩा होगा। शहरों की आर्थिक योजनाओं को जल उपलब्धता, हरित क्षेत्र, सार्वजनिक परिवहन, किफायती आवास और कचरा प्रबंधन जैसी दक्षता से जोडऩा होगा। इन व्यवस्थाओं को आबादी के बसने से पहले सुनिश्चित करना होगा। भारत के छोटे और मध्यम शहरों के उभरने का सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि विकास का दबाव कुछ महानगरों तक सीमित न रहे।


आर्थिक विकास जरूरी है, क्योंकि उसके बिना रोजगार और समृद्धि संभव नहीं। लेकिन ऐसा विकास भी अधूरा है जो लोगों की आय बढ़ाए और उनके जीवन की गुणवत्ता घटा दे। भारत के उभरते शहरों के सामने अब यही परीक्षा है कि वे केवल बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बनेंगे या ऐसे शहर भी बनेंगे जहां लोग बेहतर कमाई के साथ बेहतर जीवन भी जी सकें। क्योंकि सफल होने के लिए विकास की रफ्तार के साथ-साथ जीवन की सहजता भी जरूरी है।

Updated on:
24 Sept 2026 05:17 pm
Published on:
24 Sept 2026 05:17 pm