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संपादकीयः शहरों के संतुलित विकास से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर

दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु जैसे महानगरों पर आबादी और संसाधनों के अत्यधिक दबाव ने अब इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि संतुलित विकास तभी संभव है, जब विकास के विकेंद्रीकरण को प्राथमिकता दी जाए।
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Mar 30, 2026
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देश में रोजगार के अवसरों को लेकर आए इस बदलाव को सकारात्मक संकेत कहा जा सकता है, जिसमें कॉर्पोरेट सेक्टर में जॉब मार्केट दिल्ली, मुंबई और बेंगलूरु जैसे महानगरों से खिसककर टियर-2 शहरों की तरफ बढ़ रहा है। यह बदलाव न सिर्फ रोजगार के अवसरों का विकेंद्रीकरण करने वाला है, बल्कि विकास की उस प्रवृत्ति को भी बदलने वाला है, जिसमें महानगरों पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाता रहा है। जयपुर, इंदौर, लखनऊ और भुवनेश्वर जैसे शहरों में नई नौकरियों की मांग दर्शाती है कि यह 'रिवर्स माइग्रेशन' न केवल रोजगार चाहने वाले युवाओं, बल्कि कॉर्पोरेट जगत के लिए भी मुफीद साबित हो रहा है।

देखा जाए तो महानगरों से टियर-2 शहरों की ओर रोजगार का रुख बदलना सिर्फ आर्थिक पहलुओं से जुड़ा ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय दबावों का परिणाम भी है। महानगरों में यातायात जाम, महंगाई और प्रदूषण के संकट ने जीवन को वैसे भी परेशानियों वाला बना दिया है। इसका कारण है कि पिछले वर्षों में सरकारों ने विकास के केंद्रीकरण की तरफ ज्यादा ध्यान दिया है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु जैसे महानगरों पर आबादी और संसाधनों के अत्यधिक दबाव ने अब इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि संतुलित विकास तभी संभव है, जब विकास के विकेंद्रीकरण को प्राथमिकता दी जाए। यों समझा जाना चाहिए कि छोटे शहरों को केवल 'बैकअप' के रूप में नहीं, बल्कि 'प्राथमिक विकल्प' के रूप में तैयार करना होगा।

निश्चित ही इन शहरों के विकास से जुड़ी एजेंसियों और राज्य सरकारों की यह बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और परिवहन के साथ-साथ तकनीकी सुविधाओं के विस्तार में अधिक से अधिक निवेश करें। ऐसी स्थिति में बड़ा सवाल यही है कि क्या ये शहर उन अपेक्षित सुविधाओं को जुटा पाएंगे, जिनकी तलाश में कंपनियां और कर्मचारी दोनों ही अपनी जगह बदलने को तैयार हैं। किसी भी शहर को रोजगार का स्थायी केंद्र तब ही बनाया जा सकता है, जब वहां एयर कनेक्टिविटी, बेहतर स्थानीय परिवहन व्यवस्था, सस्ती आवासीय सुविधाएं, स्वच्छ वातावरण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हो।

ऐसा न हो कि इन शहरों पर आबादी एक बोझ बनकर ही रह जाए। जीवन की गुणवत्ता बढ़ाए बिना इन शहरों के आकर्षण को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। निश्चित ही 'रिवर्स माइग्रेशन' महानगरों में आबादी का दबाव भी कम करने वाला होगा। नीति-निर्माता एवं कॉर्पोरेट जगत दोनों को ही मिलकर विकास के विकेंद्रीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसा होने पर ही 'रिवर्स माइग्रेशन' एक अस्थायी प्रवृत्ति नहीं, बल्कि स्थायी समाधान बनकर उभरेगा। यह कदम रोजगार और जीवन की गुणवत्ता दोनों को एक तरह से नई ऊंचाइयां प्रदान करने वाला होगा।

Updated on:
30 Mar 2026 01:41 pm
Published on:
30 Mar 2026 01:41 pm