
दुबई से तेल अवीब जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में बुधवार को जो हुआ, वह किसी थ्रिलर फिल्म जैसा लगता है। 34 हजार फीट की ऊंचाई पर कॉकपिट में पायलट पर को-पायलट चाकू से हमला कर देता है, विमान कुछ ही सेकंड में हजारों फीट नीचे आ जाता है और इसमें सवार 180 लोगों की जान दांव पर लग जाती है। जख्मी होने के बावजूद भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार मुकाबला करते हुए किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाब होते हैं, जिससे विमान के अन्य यात्री वहां पहुंच ओमानी मूल के हमलावर को-पायलट पर काबू पाते हैं। संयोगवश सामान्य यात्री के रूप में मौजूद दो अन्य पायलट विमान को सऊदी अरब के शहर तबुक में सुरक्षित लैंडिंग कराने में सफल हो जाते हैं। 'अंत भला तो सब भला' मानकर लोग सुकून की सांस लेते हैं। घटना में को-पायलट की मंशा अब तक स्पष्ट नहीं हुई है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि या तो वह कोई सनकी है या फिर आतंकी पुर्जा। अटकलें यह भी हैं कि 9/11 की जैसी घटना को दोहराने की कोशिश थी, जो भारतीय पायलट की बहादुरी से विफल हो गई।
शाबाश! कैप्टन मच्छार, आप पर भारत को नाज है, क्योंकि यह सिर्फ बहादुरी नहीं, दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देने का जज्बा भी है। निश्चित रूप से आपकी सूझबूझ भरी त्वरित प्रतिक्रिया ने वह कर दिखाया जिसका उदाहरण विरले ही मिलता है। ऐसा कुछ करने के लिए चंद सेकंड ही मिलते हैं। दिमाग अपने आप चलता है, हाथों में स्वत: हरकत होती है और अनुकरणीय उदाहरण बन जाता है। इसके लिए निश्चित रूप से पायलट की कठिन ट्रेनिंग के साथ-साथ मानसिक मजबूती और निर्णय क्षमता की बड़ी भूमिका होती है। यही बात जीवन के अन्य मौकों पर भी बड़ी से बड़ी मुश्किलों में किसी व्यक्ति को रास्ता निकालने वाला लीडर बना देती है और कोई मूक दर्शक या फॉलोअर ही बना रह जाता है।
हालांकि, बहादुरी के किस्सों में असली सवाल गुम नहीं होना चाहिए। सबसे अहम सवाल तो यही है कि दुनिया में मौजूद ढेर सारे खतरों और आतंकी मंसूबों के बावजूद कोई व्यक्ति, चाहे वह पायलट ही क्यों न हो, चाकू लेकर कॉकपिट तक कैसे पहुंच गया? क्या विमान कू्र के लिए सुरक्षा जांच में लापरवाही बरती जा रही है? अब सहज रूप से यह नहीं माना जा सकता कि कू्र के सदस्यों, खासकर पायलट से विमान को कोई खतरा नहीं हो सकता। इससे पहले भी 2015 में हमने देखा है कि किस तरह बार्सिलोना (स्पेन) से डसेलडोर्फ (जर्मनी) जा रही जर्मनविंग्स की उड़ान को को-पायलट ने फ्रांस के आल्प्स पहाड़ों से टकरा दिया था, जिसमें 150 लोग मारे गए थे। खतरा सिर्फ कॉकपिट के बाहर से नहीं अंदर से भी हो सकता है। यही बात इस घटना को सबसे खतरनाक बनाती है। डीजीसीए और अंतरराष्ट्रीय विमानन संगठन को भी इस पर ध्यान देकर पुख्ता सुरक्षा तंत्र विकसित करना चाहिए।