बच्चों में किताब से दूर होने के कारण बहुआयामी हैं और इसके समाधान भी बहुआयामी ही ढूंढने होंगे। शुरुआत घर से ही करनी होगी।
-चंद्रशेखर बेंजवाल, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
पिछले साल चौथी कक्षा में पढ़ रही मेरी बेटी के स्कूल में किसी निजी प्रकाशक-विक्रेता की पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। मेरी बेटी ने भी वहां से कुछ पुस्तकें खरीदने का आग्रह किया। उपलब्ध पुस्तकों में से उसकी उम्र व बोध शक्ति के अनुरूप छांटकर मैंने उसे पंचतंत्र एवं जातक कथाएं दिलवाईं। मुझे अपनी बेटी का यह आग्रह देखा-देखी का मेला लग रहा था, लेकिन आश्चर्य, किताबों को घर लाते ही उसने उन्हें पढऩा शुरू किया। पूरा पढ़ा और दी गई कथाओं के संदर्भ व पृष्ठभूमि पर मुझसे पूछताछ की। मैंने भी सुखद प्रतिक्रिया के साथ उसकी जिज्ञासाओं को शांत किया। किताबों में उसकी रुचि जगती देख कुछ महीने बाद मैंने नेशनल बुक ट्रस्ट से कुछ और किताबें मंगवाकर दी।
इस साल स्कूल में फिर पुस्तक प्रदर्शनी लगी। उसने फिर किताब खरीदने को कहा। मैंने अबकी बार उसे जंगल बुक, शेख चिल्ली की कथाएं और अन्य बालोपयोगी किताब दिलवाईं। इस बार तो गजब ही हुआ, वह इन किताबों में ही वह ऐसी डूबी कि मां के बार-बार कहने पर भी उसे नहाने तक की सुध नहीं रही। यह छोटा-सा घटनाक्रम बताता है कि किताबें किस तरह बच्चों की आदतों और व्यवहार में परिवर्तन ला सकती हैं। जिस मोबाइल की आदत छुड़वाने के लिए हम काफी समय से डांट-फटकार जैसे उपक्रम इस्तेमाल कर रहे थे और जिसके लिए इस समय दुनिया के शिक्षक और मनोचिकित्सक माथापच्ची कर रहे हैं, उसमें चंद किताबों ने कमाल कर दिया। यह कमाल मेरी बेटी ही नहीं, तमाम बच्चों के लिए हो सकता है। इधर, कुछ वर्षों से मैंने बच्चों को किताबों की बातें करता ही नहीं सुना। मोबाइल फोन पर यूट्यूब व इंस्टाग्राम का दृश्य-श्रव्य आकर्षण उन्हें ऐसा लुभा रहा है कि बाहरी किताबें तो दूर, स्कूली पाठ्यक्रम की किताबें भी उन्हें बोझिल लगने लगी हैं। मैं इस बाबत माता-पिताओं की चिंता सुनता रहता हूं।
कोरोना महामारी के बाद तो पढऩा और लिखना, दोनों ही बच्चों की आदत से दूर हो गए हैं। बच्चों में किताब से दूर होने के कारण बहुआयामी हैं और इसके समाधान भी बहुआयामी ही ढूंढने होंगे। शुरुआत घर से ही करनी होगी। हममें से अधिकांश माता-पिता बच्चों को किताबें पढऩे के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करने की बजाय उसके मन बहलाव के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। उनकी जिज्ञासाओं का खुद जवाब देने के बजाय उसे गूगल की मदद लेने की सलाह देते हैं। अगर हम यदा-कदा बच्चे की रुचि के अनुकूल कुछ पुस्तकें लाकर उसके हाथ में रख दें तो देर-सबेर किताबों में उसकी रुचि जगने लगेगी। सिर्फ पुस्तकें लाकर देने में ही हम अपने कर्तव्य की इतिश्री न कर दे, बल्कि बच्चों से उन कथाओं को सुनें भी। इससे बच्चे को अपने पढऩे का मूल्य पता चलेगा। अपने बच्चे के सहपाठियों व मित्रों के जन्मदिन आदि पर उपहार के रूप में किताबें देना शुरू करें।
किताबों में बच्चों की दिलचस्पी जगाने में स्कूलों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। विद्यालय अपने स्तर पर पुस्तक प्रदर्शनियों का नियमित आयोजन करवाएं तो यह भी काफी मददगार होगा। सरकारी स्कूल चिल्ड्रंस बुक ट्रस्ट की किफायती दामों वाली किताबों की प्रदर्शनी लगा सकते है। लेखकों, संपादकों, प्रकाशकों, समाज चिंतकों की भी बच्चों के प्रति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। समाज में स्थापित लेखक बच्चों के लिए भी कुछ सुरुचिपूर्ण लिखने में भूमिका निभा सकते हैं। मात्र दूसरी भाषाओं का लिप्यांतरण और उपदेशात्मक ही नहीं, बल्कि बच्चों को गुदगुदाने वाला तथा उन्हें ज्ञान की विभिन्न शाखाओं से रोचक तरीके से परिचित कराने वाला। प्रकाशकों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे बच्चों की गुणवत्तापूर्ण किताबों के मूल्य को कुछ कम करें। ये सभी सामूहिक प्रयास हमें फिर उस स्थिति में पहुंचा सकते हैं, जिसमें बच्चे मोबाइल नहीं, किताबों की जिद करने लगें। ध्यान रहे एक प्रबुद्ध समाज के निर्माण के लिए इसके सदस्यों का ज्ञानवान होना जरूरी है और ज्ञान का रास्ता किताबों व अनुभव से होकर गुजरता है। नि:संदेह मोबाइल भी हमारे ज्ञानवर्धन में मददगार है, लेकिन वह नियंत्रणविहीन है और उसकी सामग्री सतही है। किताबें आपके नियंत्रण में हैं और गहरी हैं। आप इस बार अपने बच्चे के लिए दो किताबें लाकर तो देखिए।