
अल नीनो के प्रभाव के कारण देश में इस वर्ष मानसून सत्रह साल में सबसे सूखा रहा है, जिसमें कुल वर्षा सामान्य से 15 फीसदी कम दर्ज की गई है। खास बात यह है कि अब तक 14 राज्यों में बारिश की कमी 20 फीसदी से ज्यादा रही है। इनमें बिहार, पंजाब, हरियाणा के अलावा दक्षिण भारत के सभी पांच प्रायद्वीपीय राज्य शामिल हैं। दरअसल, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, वर्ष 2009 के बाद (जब 18.3 फीसदी की कमी देखी गई थी) यह देश का सबसे कमजोर मानसून सीजन साबित हुआ है। एक जून से 21 सितंबर तक की अवधि में जहां देश में सामान्य रूप से 827.2 मिमी वर्षा होनी चाहिए थी, वहीं वास्तविक आंकड़ा केवल 703.7 मिमी पर सिमटकर रह गया है। 123.5 मिमी की इस भारी गिरावट ने न केवल चालू खरीफ फसलों के उत्पादन पर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि आगामी रबी सीजन की बुवाई और देश के प्रमुख जलाशयों के जलस्तर को भी गंभीर खतरे में डाल दिया है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष मानसून के ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहने की मुख्य वजह प्रशांत महासागर में तेजी से सक्रिय हुआ 'सुपर अल नीनो' प्रभाव है। अल नीनो की स्थिति के कारण समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ गया, जिसने वैश्विक पवन प्रणालियों को बाधित किया और भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढऩे वाली मानसूनी हवाओं को कमजोर कर दिया। इस सीजन में बारिश का वितरण न केवल कम रहा, बल्कि समय और स्थान के लिहाज से भी बेहद असंतुलित था। भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर निर्भर करती है। देश के करोड़ों किसान जून से सितंबर के बीच होने वाली इस वर्षा के आधार पर ही अपनी फसलों की योजना बनाते हैं। इस साल बारिश की बेरुखी के कारण खरीफ फसलों विशेषकर धान, गन्ना, मक्का और कपास की बुवाई पिछले सीजन की तुलना में 3.73 फीसदी पिछड़ गई है। कृषि विशेषज्ञों और कमोडिटी विश्लेषकों का अनुमान है कि इस सूखे मानसून के चलते अकेले चावल के उत्पादन में दस मिलियन टन (1 करोड़ टन) तक की भारी कटौती हो सकती है।
धान के खेतों में पर्याप्त पानी न होने के कारण पौधों का विकास रुक गया है, जिससे प्रति हेक्टेयर पैदावार घटने की पूरी आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा गन्ने की फसल को भी भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे आने वाले महीनों में चीनी उत्पादन प्रभावित होना तय माना जा रहा है। साथ ही, यह रबी की फसलों (गेहूं, सरसों, चना) के लिए भी खतरनाक साबित होगी। रबी फसलों की बुवाई के समय मिट्टी में नमी की आवश्यकता होती है और सिंचाई के लिए बांधों के पानी का इस्तेमाल किया जाता है। यदि बांध खाली रहे, तो आगामी सीजन में कृषि संकट दोगुना हो सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मानसून भारतीय खेती की लाइफलाइन है। एक अनुमान के मुताबिक मानसून पर दो खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है और कम से कम पचास प्रतिशत कृषि को पानी वर्षा के जरिये ही हासिल होता है।
चिंता केवल खरीफ की मौजूदा फसलों तक सीमित नहीं है। केंद्रीय जल आयोग के अंतर्गत आने वाले प्रमुख 150 से अधिक जलाशयों में लाइव स्टोरेज (उपयोगी जल भंडारण) पिछले साल की तुलना में लगभग 36 फीसदी कम हो गया है। दक्षिण भारत के 54 प्रमुख बांधों में जलस्तर उनकी कुल क्षमता के 80 फीसदी से भी नीचे चला गया है। जलाशयों में पानी की यह कमी आने वाले सर्दियों के महीनों में बिजली उत्पादन व शहरों में पेयजल आपूर्ति को तो प्रभावित करेगी ही। कम बारिश का सीधा असर अब देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर दिखने लगा है। अगस्त के महीने में खाद्य मुद्रास्फीति (फूड इंफ्लेशन) लगातार सातवें महीने बढ़कर 5.95 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई, जो इस वर्ष का उच्चतम स्तर माना जा रहा है।
आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक, मानसून में होने वाली हर एक फीसदी की कमी खाद्य महंगाई को करीब 25 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा देती है। बाजार में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने आपातकालीन कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। चीनी की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी जा रही है। वहीं, प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों की आसमान छूती कीमतों को रोकने के लिए कई राज्यों में रियायती दरों पर सरकारी आउटलेट्स के जरिए बिक्री की जा रही है। चावल के निर्यात पर पहले से लगे प्रतिबंधों को और कड़ा किए जाने की संभावना है। मानसून 2026 के इन निराशाजनक आंकड़ों ने एक तरह से यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसी मौसमी परिघटनाएं अब भारतीय कृषि के लिए एक स्थायी चुनौती बन चुकी हैं। मौसम विभाग का कहना है कि सितंबर के अंत में बंगाल की खाड़ी में एक नया कम दबाव का क्षेत्र बन सकता है, जिससे ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में कुछ बारिश हो सकती है, लेकिन यह राष्ट्रीय स्तर पर हो चुके पन्द्रह फीसदी के बड़े घाटे को पाटने में सक्षम नहीं होगा।
इस अभूतपूर्व सूखे से निपटने के लिए तात्कालिक राहत उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीतियों की जरूरत है। सरकार को प्रभावित राज्यों में सूखा राहत पैकेज, किसानों के लिए फसल बीमा के त्वरित भुगतान और ग्रामीण रोजगार योजनाओं (वीबी-जीरामजी) को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। आने वाले समय में जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) और कम पानी में उगने वाली जलवायु-अनुकूल फसलों को बढ़ावा देना ही भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एकमात्र विकल्प होगा।
(स्वतंत्र पत्रकार, एवं स्तंभकार)