
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 व 'डिजिटल इंडिया' अभियान के अंतर्गत भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में संस्थागत सुधारों की गति अत्यंत तीव्र हुई है। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स और नेशनल एकेडेमिक डिपॉजिटरी के विस्तार के बीच विभिन्न विश्वविद्यालयों ने एक युगांतकारी निर्णय लेते हुए पारंपरिक मुद्रित अंकपत्रों (हार्डकॉपी) के वितरण को पूरी तरह बंद कर केवल 'डिजिलॉकर' के माध्यम से डिजिटल अंकपत्र उपलब्ध कराने की घोषणा की है। यह पहल विद्यार्थियों को सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में अहम पड़ाव है। किंतु भारत जैसी विशाल, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं और डिजिटल विभाजन वाली व्यवस्था में यह कदम अपने साथ कई गंभीर संरचनात्मक प्रश्न व चुनौतियां भी लेकर आता है।
डिजिलॉकर पर परीक्षा परिणाम के तुरंत बाद डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित अंकपत्र उपलब्ध होने से विद्यार्थियों को अपने घर बैठे एक क्लिक पर दस्तावेज प्राप्त हो जाएंगे। डिजिलॉकर में विश्वविद्यालय द्वारा सीधे क्रिप्टोग्राफिक सुरक्षा, डिजिटल हस्ताक्षर और क्यूआर कोड के साथ दस्तावेज अपलोड किए जाते हैं। इससे अंकपत्र में हेरफेर करना तकनीकी रूप से असंभव हो जाता है। कोई भी नियोक्ता या शैक्षणिक संस्थान क्यूआर कोड स्कैन करके या एपीआइ के माध्यम से तुरंत अंकपत्र की प्रामाणिकता की पुष्टि कर सकता है। भौतिक कागजों के साथ फटने, भीगने, दीमक लगने या खो जाने का जोखिम सदैव बना रहता है। मुद्रित अंकपत्र खो जाने पर 'डुप्लीकेट मार्कशीट' बनवाने की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया विद्यार्थियों के लिए भारी मानसिक व आर्थिक प्रताडऩा का कारण बनती है। डिजिलॉकर क्लाउड व्यवस्था में दस्तावेज आजीवन सुरक्षित रहते हैं, जिन्हें आवश्यकता पडऩे पर कभी भी प्राप्त किया जा सकता है। सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था जितनी आधुनिक और आकर्षक दिखती है, भारत के ग्रामीण और कस्बाई समाज की जमीनी सच्चाइयों के सामने यह उतनी ही पेचीदा भी है- देश के अधिकांश राज्य विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों का बहुत बड़ा अनुपात ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग से आता है। सभी विद्यार्थियों के पास स्मार्ट डिवाइस, कंप्यूटर या निर्बाध हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध नहीं है। इस कारण विद्यार्थी स्थानीय साइबर कैफे पर निर्भर हो जाते हैं, जहां उनसे प्रिंटआउट और डाउनलोडिंग के लिए शुल्क वसूला जाता है। इस प्रकार, जो सेवा मुफ्त और सुगम होनी चाहिए थी, वह विद्यार्थियों के लिए आर्थिक भार बन जाती है।
इसके अलावा डिजिलॉकर का संचालन पूरी तरह से आधार प्रमाणीकरण और उससे जुड़े मोबाइल नंबर के ओटीपी पर टिका है। भारत में ग्रामीण विद्यार्थियों के 10वीं/12वीं के प्रमाणपत्र, विश्वविद्यालय के नामांकन और आधार कार्ड में दर्ज नाम की स्पेलिंग (वर्तनी) या जन्मतिथि में विसंगति होना बहुत आम है। यदि आधार और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में एक अक्षर का भी अंतर हुआ, तो डिजिलॉकर दस्तावेज जारी करने से इनकार कर देता है। यदि विद्यार्थी का पुराना मोबाइल नंबर बंद हो चुका है, तो ओटीपी न मिलने के कारण वह अपने ही शैक्षणिक रिकॉर्ड से पूरी तरह कट जाता है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत डिजिलॉकर के डिजिटल दस्तावेज कानूनी रूप से वैध हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कानून लागू नहीं होता। विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए आवेदन करने वाले विद्यार्थियों को 'ट्रांसक्रिप्ट' विश्वविद्यालय की आधिकारिक मुहर और सीलबंद लिफाफे में भौतिक रूप से जमा करनी होती है। 'वल्र्ड एजुकेशन सर्विसेज' जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां प्राय: केवल डिजिलॉकर का डिजिटल प्रिंटआउट स्वीकार नहीं करतीं। विदेशी दूतावासों और वीजा प्रक्रियाओं में 'अपोस्टिले' और भौतिक अटेस्टेशन के लिए मूल कागजी दस्तावेज अनिवार्य होते हैं। डिजिटल व्यवस्था में यदि एक बार डेटा गलत सिंक हो गया, तो पोर्टल पर उसमें सुधार करवाना एक अत्यंत लंबी, बहुस्तरीय और थकाऊ तकनीकी प्रक्रिया बन जाता है। तकनीकी प्रगति से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, लेकिन तकनीक का उद्देश्य विद्यार्थियों की सुविधा बढ़ाना होना चाहिए, न कि उनके सामने नए अवरोध खड़े करना। भारत में 'पूर्णत: डिजिटल' का मॉडल एकाएक लागू करने के बजाय संतुलित, चरणबद्ध व समावेशी दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। विश्वविद्यालय को डिजिलॉकर को प्राथमिक माध्यम अवश्य बनाना चाहिए, किंतु भौतिक प्रतियों को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।
जो विद्यार्थी विदेश अध्ययन, वीजा सत्यापन या अन्य विशेष परिस्थितियों के लिए मुद्रित मार्कशीट चाहते हैं, उन्हें न्यूनतम शुल्क पर आधिकारिक हार्डकॉपी प्राप्त करने का विकल्प अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए। प्रत्येक संबद्ध कॉलेज में 'डिजिलॉकर हेल्पडेस्क' की स्थापना की जानी चाहिए, जहां ग्रामीण विद्यार्थियों को बिना किसी शुल्क के दस्तावेज डाउनलोड करने, आधार त्रुटि सुधारने और प्रिंट प्राप्त करने में तकनीकी सहायता दी जाए। परीक्षा अनुभाग में विशेष 'डिजिटल ग्रीवांस सेल' होना चाहिए, जो नाम, जन्मतिथि या अंक विसंगतियों को 48 से 72 घंटों के भीतर डेटाबेस पर संशोधित कर डिजिलॉकर पर री-सिंक कर सके। राज्य सरकारों और यूजीसी को सभी सरकारी व निजी नियोक्ताओं को यह स्पष्ट निर्देश जारी करने चाहिए कि डिजिलॉकर से जारी डिजिटल रूप से सत्यापित अंकपत्र हर स्तर पर 100त्न मान्य हैं, ताकि विद्यार्थियों से अनावश्यक भौतिक मूल प्रतियों की मांग न की जाए। डिजिलॉकर व्यवस्था भविष्योन्मुखी व साहसिक है, परंतु इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सुधार विद्यार्थी के लिए कितना सुलभ, संवेदनशील और व्यावहारिक सिद्ध होता है।
प्रो. अशोक कुमार, (पूर्व कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय)