ओपिनियन

डिजिटल से जिंदगी आसान, लेकिन ठगी का खतरा भी बढ़ा

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीआरपी पर वर्ष 2021 से 2025 के बीच वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की 65.89 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं। इन शिकायतों में करीब 55 हजार करोड़ रुपए की रकम रिपोर्ट की गई।
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Sep 29, 2026
cyber fraud
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राकेश शर्मा को सपरिवार उज्जैन जाकर महाकाल के दर्शन करने थे। रहने की व्यवस्था के लिए उन्होंने इंटरनेट पर महाकाल परिसर के पास बने माधव सेवा न्यास को सर्च किया। सर्च के दौरान एक वेबसाइट सामने आई, जो देखने में बिल्कुल असली लग रही थी। उन्होंने उसी वेबसाइट पर कमरा बुक किया और ऑनलाइन 10 हजार रुपए का भुगतान कर दिया। बाद में पता चला कि वेबसाइट फर्जी थी। राकेश ने तत्काल साइबर सेल में शिकायत की, लेकिन अब उन्हें इस बात का इंतजार है कि उनकी शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई होती है? यह सिर्फ राकेश की कहानी नहीं है।

डिजिटल तकनीक ने हमारी जिंदगी को बेहद आसान बनाया है, लेकिन इसी सुविधा के साथ साइबर ठगी का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। आज ठगी करने वाले सिर्फ फोन करके ओटीपी मांगने तक सीमित नहीं हैं। नकली वेबसाइट, फर्जी ऐप, पार्ट-टाइम जॉब का लालच, डिजिटल अरेस्ट, फर्जी निवेश, क्यूआर कोड, फिशिंग लिंक, सोशल मीडिया प्रोफाइल और एआइ से बनाई गई आवाज या वीडियो, ठग लगातार नए तरीके खोज रहे हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी बड़ी हो चुकी है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीआरपी पर वर्ष 2021 से 2025 के बीच वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की 65.89 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं। इन शिकायतों में करीब 55 हजार करोड़ रुपए की रकम रिपोर्ट की गई। सरकार ने साइबर ठगी के बाद पैसे को आगे जाने से रोकने के लिए 1930 हेल्पलाइन और सिटीजन फाइनेंस साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (सीएफसीएफआरएमएस) बनाया है। 30 जून तक इस व्यवस्था के जरिये 32.80 लाख से अधिक शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम बचाए जाने की जानकारी सरकार ने दी है। इसका मतलब साफ है, ठगी होने के बाद शुरुआती समय में की गई शिकायत बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। दरअसल, साइबर ठग आमतौर पर अपना पैसा सीधे अपने बैंक खाते में नहीं मंगाते। इसके लिए वे दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे खातों को आम तौर पर 'मनी म्यूल अकाउंट' कहा जाता है। कई बार लोग कुछ हजार रुपए के लालच में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड या बैंकिंग सुविधाएं किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए दे देते हैं। कुछ मामलों में खाताधारक को यह पता भी नहीं होता कि उसके खाते का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम घुमाने के लिए किया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक भी लोगों को चेतावनी देता रहा है कि अपने बैंक खाते को किसी दूसरे व्यक्ति के पैसों के लेन-देन के लिए इस्तेमाल न होने दें। ठगी की रकम एक खाते में पहुंचने के बाद कुछ ही समय में दूसरे, तीसरे और कई बार उससे भी ज्यादा खातों में भेज दी जाती है। यही वजह है कि पुलिस और बैंकिंग प्रणाली के लिए पैसा जिस खाते में सबसे पहले पहुंचा, वह एक महत्वपूर्ण सुराग बन जाता है। इसी प्रक्रिया में कभी-कभी निर्दोष लोग भी परेशान हो जाते हैं। सरकार ने अब इस समस्या से निपटने के लिए बैंकिंग संस्थानों के साथ 'सस्पेक्ट रजिस्ट्रीÓ भी शुरू की है। जनवरी 2026 तक सरकार के अनुसार 27.37 लाख से ज्यादा लेयर-1 म्यूल अकाउंट्स की जानकारी संबंधित संस्थानों के साथ साझा की जा चुकी थी और 9,518 करोड़ रुपए से अधिक के संदिग्ध लेन-देन को रोका गया था। हालांकि, भारत में साइबर क्राइम से निपटने के लिए आइटी एक्ट, 2000 के साथ-साथ अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 सहित दूसरे आपराधिक कानूनों की धाराओं का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि साइबर अपराध के लिए सिर्फ 15-20 साल पुराने कानून ही लागू हैं। हां, यह जरूर है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम मूल रूप से 2000 का कानून है और उसका बड़ा संशोधन 2008 में हुआ था। दूसरा, साइबर क्राइम का स्वरूप इस दौरान बहुत बदल चुका है। आज अपराधी सोशल मीडिया, क्लाउड सेवाओं, क्रिप्टोकरेंसी, फर्जी सिम, मनी-म्यूल नेटवर्क और एआइ जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए कानून के साथ-साथ जांच की तकनीक, पुलिस की विशेषज्ञता और राज्यों के बीच समन्वय को भी लगातार मजबूत करना जरूरी है। सरकारी स्तर पर भी इस दिशा में काम हो रहा है। आइ4सी के तहत साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर में बैंक, भुगतान कंपनियां, टेलीकॉम कंपनियां और पुलिस एजेंसियां मिलकर साइबर ठगी की रकम को रोकने पर काम करती हैं। सरकार ने साइबर अपराध की जांच के लिए समन्वय, प्रतिबिंब जैसे प्लेटफॉर्म भी विकसित किए हैं।

फिर, एआइ ने साइबर अपराध को एक नया चेहरा दे दिया है। अब किसी परिचित की आवाज जैसी आवाज बनाकर फोन किया जा सकता है। नकली वीडियो तैयार किए जा सकते हैं। फर्जी तस्वीरें और दस्तावेज बनाए जा सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में सिर्फ यह देखकर भरोसा करना मुश्किल होगा कि फोन पर आवाज किसी परिचित व्यक्ति जैसी ही क्यों न लग रही हो, पर एआइ अपराधियों के लिए जितना बड़ा हथियार है, सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी उतना ही उपयोगी साबित हो सकता है। बैंकिंग क्षेत्र में संदिग्ध लेन-देन पहचानने के लिए एआइ और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल बढ़ रहा है।डिजिटल दुनिया से पीछे लौटना अब संभव नहीं है और न ही इसकी जरूरत है। जरूरत है डिजिटल सुविधा के साथ डिजिटल समझ बढ़ाने की। आज साइबर ठगी का शिकार कोई भी हो सकता है, बुजुर्ग, युवा, व्यापारी, नौकरीपेशा, छात्र या कोई परिवार जो सिर्फ महाकाल के दर्शन के लिए ऑनलाइन कमरा बुक कर रहा हो। इसलिए सावधानी ही सबसे पहली सुरक्षा है। सतर्क रहें, जल्द शिकायत करें और अपनी डिजिटल जानकारी को उतनी ही सावधानी से संभालें, जितनी सावधानी से अपनी जेब और घर की चाबी संभालते हैं।

साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट

Updated on:
29 Sept 2026 05:27 pm
Published on:
29 Sept 2026 05:27 pm