कभी जब भी मन बोझिल होने लगे और ऐसा कुछ विचार दिमाग में आए तो बस, एकांत में बैठकर इतना सोचिए कि आपके जाने के बाद, आपके पीछे जितने भी लोग छूट रहे हैं, उन पर क्या बीतेगी? क्या वह जी पाएंगे आपके बिना? क्या हम स्वार्थी तो नहीं हो रहे हैं, जो सिर्फ अपना ही सोच पा रहे हैं।
गीतिका जैन - स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार
ऐसा क्या हो जाता है कि इतनी खूबसूरत लगने वाली दुनिया से हम अचानक मुंह मोड़ लेते हैं, हमारा मन उचट जाता है इस दुनिया से और हम आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लेते हैं। क्या दुनिया इतनी बुरी हो जाती है या हम समाज के जटिलताओं के आगे हार जाते हैं। यह तो तय है कि किसी भी समस्या का हल आत्महत्या तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता, उसका हल तो हमको जिंदा रहते ही निकालना होगा।
माना कि जिंदगी में हार मिली, लेकिन हर हार का मतलब यह तो नहीं कि जीतने की गुंजाइश खत्म हो गई, हम जीत सकते हैं बिल्कुल, लेकिन उसके लिए जिंदगी का होना बहुत जरूरी है। हो सकता है कि जिंदगी की रफ्तार का पहिया धीमे चल रहा हो, लेकिन उनके धीमे होने का मतलब यह तो नहीं कि उस पहिए को ही रोक दिया जाए। कभी जब भी मन बोझिल होने लगे और ऐसा कुछ विचार दिमाग में आए तो बस, एकांत में बैठकर इतना सोचिए कि आपके जाने के बाद, आपके पीछे जितने भी लोग छूट रहे हैं, उन पर क्या बीतेगी? क्या वह जी पाएंगे आपके बिना? क्या हम स्वार्थी तो नहीं हो रहे हैं, जो सिर्फ अपना ही सोच पा रहे हैं। हमारी जिंदगी से जुड़ी, कई और जिंदगियां भी तो होती हैं। आपने कभी सोचा कि क्या यह जिंदगी आपके बिना, उनके लिए आसान होगी? नहीं, शायद बिल्कुल भी नहीं, जिंदगी लडऩे का नाम है, थकने का या हार मानने का नहीं।
जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ेगा, परेशानियों का हल भी मिलने लगेगा, लेकिन अगर जिंदगी का दामन छूटा तो 'जिंदगी ना मिलेगी दोबारा'। जब भी लगे कि उम्मीद का दामन छूट रहा है। सब कुछ हाथ से फिसल रहा है, तो बस ज्यादा कुछ नहीं करना है जिंदगी की ओर, एक कदम बढ़ाना है और थाम लेना है किसी अपने का हाथ, निश्चित ही वह आपको भावनाओं के उफनते तूफानों से बाहर ला सकता है। बस मन में न रखिए अपने गुबारों को, बात कीजिए, खुलकर किसी अपने से, यकीन मानिए दुनिया में हर समस्या का समाधान है।
क्या सिर्फ दोष, उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है, जिसके मन में ऐसे नकारात्मक विचार आए और वह दुनिया से रुखसत हो गया, क्या उसके साथ रहने वालों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती थी, क्यों वह नहीं पढ़ पाए उसकी आंखों को, क्यों नहीं महसूस कर पाए उसकी भाव-भंगिमाओं को। कुछ पल रुककर उससे पूछते तो सही, उसको यह अहसास तो कराते कि दुनिया की कोई भी परिस्थिति हो, मैं हूं तुम्हारे पास। निराशा के भंवर में फंस चुके व्यक्ति को, आपके हौसला देने वाले कुछ शब्द, उसके मौत की तरफ बढ़ते कदमों को रोक सकते हैं। उसको ऐसी परिस्थिति में अकेला ना छोड़ें, जहां वह संघर्ष कर रहा हो जिंदगी और मौत में से किसी एक को चुनने का। हारती-थकती जिंदगी की शाम को एक नया सवेरा दिखाने का संकल्प लीजिए।