यह तथ्य सर्वविदित है कि बच्चे जो देखते हैं उसे अपनाने की कोशिश सबसे पहले करते हैं। रंगीन पैकेजिंग, कार्टून पात्र और आकर्षक स्लोगन उन्हें लुभाते हैं। विज्ञापनों से सबसे ज्यादा बच्चों के प्रभावित होने की वजह भी यही है।
बच्चों के आहार में पौष्टिक तत्वों के बजाय हानिकारक जंक फूड शामिल होने से मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों का खतरा लगातार बना हुआ है। चिकित्सक लगातार चेतावनी भी दे रहे हैं कि आज अधिकांश बच्चे पौष्टिक भोजन की जगह जंक फूड और कार्बोनेटेड पेय पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, जिससे उनमें मोटापा, कमजोरी और मानसिक अवसाद जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। इतना ही नहीं, गर्भवती महिलाएं भी इस जीवनशैली से अछूती नहीं हैं, जिसका सीधा असर गर्भस्थ शिशु के विकास पर पड़ रहा है। जंक फूड के इन्हीं खतरों से जुड़ी चिंता ब्रिटेन में लागू उस आदेश में झलकती है जिसके तहत वहां सरकार ने रात 9 बजे से पहले टीवी व ऑनलाइन प्लेफॉम्र्स पर जंक फूड के विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक लगा दी है। यह प्रतिबंध उन खाद्य उत्पादों पर लागू हो गया है जिनमें फैट, नमक व चीनी की मात्रा अधिक होती है। भारत में भी इन मामलों में सख्ती बरतने की जरूरत है।
यह तथ्य सर्वविदित है कि बच्चे जो देखते हैं उसे अपनाने की कोशिश सबसे पहले करते हैं। रंगीन पैकेजिंग, कार्टून पात्र और आकर्षक स्लोगन उन्हें लुभाते हैं। विज्ञापनों से सबसे ज्यादा बच्चों के प्रभावित होने की वजह भी यही है। विज्ञापनों के प्रति ऐसे आकर्षण का ही नतीजा है कि पौष्टिक भोजन पीछे छूट जाता है और बच्चों की थाली में जंक फूड उनकी पहली पसंद के रूप में सामने आता है। ऐसे आकर्षण की रोकथाम के लिए ब्रिटेन सरकार ने जो कदम उठाया है उसमें व्यावसायिक हितों से ज्यादा बच्चों की सेहत की चिंता की गई है। जबकि हमारे यहां गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर जारी दिशा-निर्देशों तक की पालना ठीक से नहीं हो पा रही है। ऐसे में जंक फूड से जुड़े विज्ञापनों का समय तय करना भी एक बड़ी चुनौती है। स्कूलों के आसपास जंक फूूड की बिक्री रोकने के आदेश भी कागजी ही साबित होते दिख रहे हैं। हमारे यहां तो स्कूल तक में बच्चों के टिफिन में पौषक तत्व कम बल्कि सेहत के लिए खतरा बनने वाले जंक फूड ज्यादा होते हैं। हैरत की बात यह है कि घर-परिवारों में भी बच्चों की सेहत की चिंता नहीं की जा रही और उन्हें जंक फूड खिलाने से परहेज नहीं किया जा रहा। यह सब उस संकट के बीच है जब बच्चों के पास खेल-कूद का समय व खेल मैदान पहले ही कम होते जा रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चे ही नहीं बल्कि हर वर्ग के लिए भले ही जंक फूड स्वाद बढ़ाने वाले हों, लेकिन सेहत की दृष्टि से देखें तो ये एक तरह से बीमारियों के दरवाजे हैं।
वक्त आ गया है जब ब्रिटेन की तरह भारत में भी ऐसे विज्ञापनों के प्रसारण व समय दोनों को नियंत्रित किया जाए। बच्चों को दादी-नानी के जमाने के पौष्टिक व्यंजनों के बारे में अवगत कराना जरूरी है। स्कूली स्तर से ही यह काम बेहतर तरीके से हो सकता है। समाज, सरकार और अभिभावकों को मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि बच्चों को सेहतमंद रखा जा सके।