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संपादकीय: इसरो के सम्मुख चुनौतियों के बीच उम्मीद की किरण

पहली बार अंतरिक्ष एजेंसी किसी विदेशी ग्राहक के लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही है। ऐसे में कभी सफलता और कभी विफलता का सामना होना स्वाभाविक है।

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Jan 14, 2026

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के 'वर्कहॉर्स' ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यानी पीएसएलवी की हालिया विफलता चिंताजनक है। चिंता इसलिए जरूरी है क्योंकि पिछले नौ महीने में इसरो के दो मिशन विफल हो गए। वे भी ऐसी संस्था के, जिसने दुनियाभर में अपनी सटीकता व कम लागत के लिए लोहा मनवाया है। इतना अवश्य है कि इसे सिर्फ विफलता के रूप में देखना इसरो की 32 साल की गौरवशाली यात्रा के साथ अन्याय होगा, जिसमें सफलताओं का शानदार रिकॉर्ड भी है। इस मिशन की विफलता केवल एक रॉकेट का गिरना ही नहीं है।

पहली बार अंतरिक्ष एजेंसी किसी विदेशी ग्राहक के लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही है। यह पहली बार था कि निजी स्टार्टअप कंपनियों द्वारा निर्मित पेलोड ले जाने वाला कोई वाणिज्यिक उपग्रह मिशन विफल हुआ। यह उपग्रह सामरिक दृष्टि से भी अहम रहने वाला था। एक तरह से सीमा सुरक्षा के लिए हमारी 'आंख' तो बनता ही, मिट्टी के प्रकार बताकर कृषि क्षेत्र में भी क्रांति लाने का काम इसके जरिए होने वाला था। हमारी सैन्य निगरानी क्षमता बढ़ाने के लक्ष्य पूरे करने में अब विलंब की आंशका भी बनी है। विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण न हो पाने से इसरो के वैश्विक कमर्शियल मार्केट पर भी असर पड़ सकता है। अंतरिक्ष में अनुसंधान प्रक्रिया का दौर एक सतत प्रक्रिया है। ऐसे में कभी सफलता और कभी विफलता का सामना होना स्वाभाविक है। इसमें दो राय नहीं कि हमारे वैज्ञानिक लगातार मेहनत के जरिए बेहतर नतीजे लाने में कामयाब होते रहे हैं। इसीलिए भारत, अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी तेजी के साथ अपनी ताकत बढ़ा रहा है और यही वजह है कि इसरो की वैश्विक विश्वसनीयता भी बढ़ी है। किसी भी देश के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र में मिलने वाली उपलब्धियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा मेें तो आगे लाती ही है, राष्ट्र गौरव का भाव भी बनता है। हमारे वैज्ञानिक इस दिशा में सतत प्रयास कर भी रहे हैं। पीएसएलवी सी-62 की विफलता के बीच गंभीर तथ्य यह भी है कि अब हमारी अमरीकी नौवहन प्रणाली पर निर्भरता बढ़ेगी। पीएसएलवी को फिर से उड़ान भरने में कम से कम छह माह का समय लगने वाला है। जाहिर है इससे हमारे कई दूसरे मिशनों की गति भी धीमी हो सकती है।

बहरहाल चंद्रयान-1, मंगलयान और आदित्य जैसी सफलताएं देने वाली संस्था से देश की उम्मीदें बहुत ऊंची हैं। इतिहास गवाह है कि इसरो ने पहले भी कई बार विफलताओं को चुनौती के रूप में लिया है और अपनी विफलता के बाद दोगुनी ताकत के साथ वापसी की है। यह चुनौती अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए नए सुधार का अवसर है। इसरो को अपनी तकनीकी प्रक्रियाओं की गहराई से समीक्षा करते रहना चाहिए। इससे ही 'वर्कहॉर्स' का 'भरोसेमंद' होने का तमगा और मजबूत होगा। उम्मीद है कि इसरो इस झटके से उबरकर अंतरिक्ष में तिरंगे को शान से फहराने की तैयारियों में जुटेगा।

Published on:
14 Jan 2026 01:53 pm
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