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संपादकीय : कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के हों प्रयास

ताजा आंकड़ों के मुताबिक 30 अगस्त तक देश में 597.6 मिलिमीटर बारिश हुई है जबकि यह 693.9 मिमी होनी चाहिए थी। हालांकि कुछ इलाकों में सामान्य से अधिक बरसात भी देखी गई है। मोटे अनुमान के अनुसार कुछ राज्यों में अतिवृष्टि को छोड़ दें तो सितंबर में भी सामान्य से कम बरसात होने का ही अनुमान लगाया जा रहा है। बरसात को लेकर यह अनुमान चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि मानसून आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ग्रामीण आय, उपभोग, रोजगार और खाद्य सुरक्षा का बड़ा आधार कृषि ही है। इस बार भी कहीं कम वर्षा से खरीफ की बुवाई प्रभावित हुई है तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने आपदा का रूप लिया है। बुवाई घटने का सीधा असर पैदावार पर पडऩे वाला है और जाहिर है इस वजह से महंगाई की मार और पड़ेगी।
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Sep 01, 2026
Crop

दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम दौर में देश के 14 राज्यों में सामान्य से कम बरसात से कृषि उत्पादन का संतुलन बिगडऩे का खतरा उत्पन्न हो गया है। जाहिर है इसका असर खाद्य आपूर्ति और मूल्य स्थिरता दोनों पर पडऩे के आसार बन गए हैं। मौसम विभाग ने पहले ही देश के अधिकांश हिस्सों में औसत से कम बरसात का अनुमान लगाया था। ताजा आंकड़ों के मुताबिक 30 अगस्त तक देश में 597.6 मिलिमीटर बारिश हुई है जबकि यह 693.9 मिमी होनी चाहिए थी। हालांकि कुछ इलाकों में सामान्य से अधिक बरसात भी देखी गई है। मोटे अनुमान के अनुसार कुछ राज्यों में अतिवृष्टि को छोड़ दें तो सितंबर में भी सामान्य से कम बरसात होने का ही अनुमान लगाया जा रहा है।
बरसात को लेकर यह अनुमान चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि मानसून आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ग्रामीण आय, उपभोग, रोजगार और खाद्य सुरक्षा का बड़ा आधार कृषि ही है। इस बार भी कहीं कम वर्षा से खरीफ की बुवाई प्रभावित हुई है तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने आपदा का रूप लिया है। बुवाई घटने का सीधा असर पैदावार पर पडऩे वाला है और जाहिर है इस वजह से महंगाई की मार और पड़ेगी। खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का सीधा असर परिवारों के बजट पर पड़ता है। चिंताजनक तथ्य यह भी है कि जिस अवधि में मानसून को सबसे ज्यादा सक्रिय होना चाहिए था, उस अवधि में वह कमजोर रहा है। अहम बात यह है कि मौसम विभाग के पूर्वानुमान में सितंबर तक मानसून में किसी बड़े सुधार के संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में बारिश की कमी की भरपाई हो पाएगी, इसकी उम्मीद कम ही है। मौसम विभाग का पूर्वानुमान यही कहता है कि मानसून सीजन के बाकी हिस्से में बारिश का प्रदर्शन क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग रह सकता है। कुछ इलाकों में अच्छी बारिश भी हो सकती है। बरसात के पैटर्न में आए इस बदलाव की वजह अल नीनो को माना जा रहा है। इतना ही नहीं, इसके असर से तापमान भी बढ़ता है। फसलों पर दोहरा असर इन्हीं कारणों से पड़ता है। पैदावार में कमी का असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है। ऐसे में कर्ज के बोझ में दबना उनकी मजबूरी हो जाती है। जलवायु परिवर्तन के खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। मौसम तंत्र में आ रहे बदलाव की बड़ी वजह भी इनसे जुड़ी है। ऐसे में जरूरत वर्षा पर निर्भरता घटाने की तो है ही, किसानों को प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रखने वाली नीतियां भी बनानी होंगी।
मानसून की अस्थिरता से बार-बार झटके खाती जा रही भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की भी जरूरत है। सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था, भंडारण के पुख्ता इंतजाम और कृषि में तकनीकी नवाचार नहीं किए गए तो हर वर्ष महंगाई का दबाव तो बढ़ेगा ही, किसानों की आय में भी अस्थिरता का दौर बना रहेगा।

Updated on:
01 Sept 2026 04:03 pm
Published on:
01 Sept 2026 04:03 pm