फुटपाथ केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि आजीविका का आधार भी हैं। आर्थिक पक्ष की अनदेखी कर केवल निष्कासन-आधारित नीति अपनाना न्यायसंगत नहीं है। चंडीगढ़ की तर्ज पर इनफॉर्मल एक्टिविटीज के लिए खुला क्षेत्र नियोजित किया जा सकता है।
चंद्र शेखर पाराशर - पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक,
किसी भी सभ्य, सुरक्षित और समावेशी शहर की पहचान उसके पैदल यात्रियों की सुरक्षा से होती है। फुटपाथ केवल सीमेंट या पत्थर की पट्टी नहीं, बल्कि नागरिकों के सुरक्षित, सम्मानजनक और बाधारहित आवागमन का संविधान प्रदत्त मूलाधिकार हैं। इसके बावजूद शहरों में फुटपाथ या तो अनुपस्थित हैं या अतिक्रमण, अवैध पार्किंग, अस्थायी ढांचों और अव्यवस्थित उपयोग के कारण अनुपयोगी बन चुके हैं। परिणामस्वरूप पैदल यात्रियों विशेषकर बच्चों, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजन को सड़क पर चलने के लिए विवश होना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि पैदल यात्री सड़क उपयोगकर्ताओं का सबसे संवेदनशील वर्ग है और उसकी सुरक्षा राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'जीवन के अधिकार' की व्यापक व्याख्या करते हुए सुरक्षित और सम्मानजनक आवागमन को भी इसमें समाहित माना है। राज शेखर बनाम भारत संघ (2012) के संदर्भ में पिछले वर्ष 14 मई के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि फुटपाथ केवल पैदल यात्रियों के लिए हैं, उनका उपयोग स्थायी अतिक्रमण या पार्किंग के लिए नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकारें एवं स्थानीय निकाय बाधारहित और सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध कराने के लिए उत्तरदायी हैं। तकनीकी और अभियांत्रिकी मानकों की दृष्टि से इंडियन रोड्स कांग्रेस के दिशानिर्देश स्पष्ट हैं। फुटपाथ की न्यूनतम चौड़ाई प्राय: 1.5 से 3 मीटर के बीच समतल और फिसलन रहित सतह लगभग 1:12 ढाल का रैम्प, उचित जल निकासी और निरंतर पैदल पथ के रूप में होने चाहिए, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये मानक केवल कागजों तक सीमित हैं। भौतिक स्तर पर 'कर्ब की ऊंचाई' (कर्ब हाइट्स) में भारी असमानता देखने को मिलती है, जिससे यह विभिन्न आयु वर्गों के लिए अगम्य हो जाता है। निजी संपत्तियों तक पहुंच और मनमाने रैम्प के कारण फुटपाथों की निरंतरता बार-बार टूट जाती है। कॉलोनियों और सोसायटियों में फुटपाथ निर्माण के लिए कोई स्थानीय दिशानिर्देश नहीं हैं, जिससे हर व्यक्ति अपनी सुविधानुसार अपने घर के आगे की जगह का उपयोग पार्किंग, पौधरोपण या अतिक्रमण के लिए कर लेता है।
सामान्यत: सड़कों के पुन: डामरीकरण के दौरान एक बड़ी तकनीकी लापरवाही देखने को मिलती है। पुरानी या खराब हो चुकी परत को हटाए बिना ही वर्तमान सड़क के ऊपर नई परत बिछा दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप सड़क और फुटपाथ की ऊंचाई लगभग समान हो जाती है। कई बार तो यह भी देखा गया है कि सड़क का स्तर उठने से फुटपाथ सड़क की ऊंचाई से भी नीचे चला जाता है। नतीजतन, बारिश के मौसम में जलभराव के कारण फुटपाथ उपयोग के लायक ही नहीं बचते। ऊंचाई के इस अंतर के खत्म होने का एक दुष्परिणाम यह भी है कि अक्सर दोपहिया या अन्य वाहन आसानी से फुटपाथ पर चढ़ जाते हैं, जिससे पैदल यात्रियों का जीवन और भी संकट में आ जाता है।
विभिन्न सरकारी विभागों में फुटपाथों के प्रति संवेदनशीलता का घोर अभाव है। अक्सर बिजली विभाग या अन्य एजेंसियां पैदल मार्ग को अवरुद्ध करते हुए फुटपाथ पर ही यूटिलिटी बॉक्स और ट्रांसफॉर्मर लगा देती हैं। हद तो तब हो जाती है जब नगर निगम स्वयं फुटपाथों पर सार्वजनिक शौचालय बना देता है। सीवरेज लाइन या अन्य कार्यों के लिए फुटपाथ खोदे जाते हैं, लेकिन बाद में उनकी मरम्मत नहीं की जाती। बढ़ते वाहनों के दबाव के कारण बने हुए फुटपाथ छोटे कर दिए जाते हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उपयोग योग्य फुटपाथ 10-15% से अधिक नहीं हैं और 2019 के एक सर्वे में सामने आया कि 72% लोग फुटपाथ का उपयोग ही नहीं करते। फुटपाथों की निरंतर अनुपलब्धता ने आम जनता में एक मनोवैज्ञानिक धारणा विकसित कर दी है कि चलने के लिए सड़क का किनारा ही एकमात्र विकल्प है। कई बार सड़क की बायीं लेन वाहनों की पार्किंग से घिरी होती है, जिसके बाद लोग सड़क के बीच में चलने को मजबूर होते हैं। यह भी स्वीकार करना होगा कि फुटपाथ केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए आजीविका का आधार हैं। आर्थिक पक्ष की अनदेखी कर केवल निष्कासन-आधारित नीति अपनाना न्यायसंगत नहीं है। चंडीगढ़ की तर्ज पर इनफॉर्मल एक्टिविटीज के लिए खुला क्षेत्र नियोजित किया जा सकता है। स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 के तहत वेंडिंग जोन का वैज्ञानिक निर्धारण और लाइसेंस प्रणाली संतुलित समाधान प्रदान कर सकते हैं। जहां फुटपाथ पर्याप्त चौड़े हों, वहां पैदल मार्ग से पृथक वेंडिंग बे विकसित किए जा सकते हैं।
सड़क के मार्गाधिकार की भूमियों पर करोड़ों रुपए की भूमि पर अवैध कब्जे हैं, जिनको सख्ती से खाली करवाना होगा। मास्टर प्लान में पैदल यात्री प्राथमिकता का समावेशन किया जाए। मार्गाधिकार के समुचित डिजाइन में नगर नियोजकों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसे स्थानीय निकायों द्वारा प्राय: पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। जनसहभागिता के बिना यह लक्ष्य अधूरा रहेगा। नागरिकों को भी फुटपाथों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अवैध निर्माण करने वालों को रोकना होगा और जहां फुटपाथ बने हैं, वहां निडर होकर उपयोग करना होगा। कानून मौजूद हैं, तकनीकी मानक हैं और न्यायालय की दिशा स्पष्ट है। जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सहयोग की।