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सरलता की सहज मूरत – लाल बहादुर शास्त्री

डॉ. दिनेश कुमार जांगिड़आइआरएस, कवि और लेखकअगर आपके समक्ष किसी व्यक्ति का एक चित्र रख दिया जाए और उसे देखते ही मन में सहजता एवं सरलता के भाव आने लग जाएं तो समझ लीजिए कि वह चित्र निश्चय ही हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का होगा। बिहार के मुगलसराय में 2 अक्टूबर […]

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Oct 02, 2024


डॉ. दिनेश कुमार जांगिड़
आइआरएस, कवि और लेखक
अगर आपके समक्ष किसी व्यक्ति का एक चित्र रख दिया जाए और उसे देखते ही मन में सहजता एवं सरलता के भाव आने लग जाएं तो समझ लीजिए कि वह चित्र निश्चय ही हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का होगा। बिहार के मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 को मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एवं रामदुलारी के यहां जन्म लेने वाले लाल बहादुर शास्त्री ने अपने प्रारंभिक जीवन से ही संघर्षों का सामना आरंभ कर दिया था। जब उनकी आयु 18 माह की थी, उसी समय उनके पिता का साथ छूट गया। उनकी परवरिश नाना के घर पर हुई। उन्होंने स्थानीय विद्यालयी शिक्षा के बाद में काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। शास्त्री की उपाधि मिलते ही उन्होंने अपने नाम के आगे से जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव की जगह शास्त्री लिखना आरंभ कर दिया जो उनकी समावेशी सोच का एक उदाहरण है।
कद-काठी में वह भले ही साधारण रहे लेकिन उनकी सोच हमेशा उच्चतम शिखर पर विराजित रही। भारत जैसे देश के लिए जवान और किसान का महत्त्व क्या है, यह उनके दिए गए नारे- 'जय जवान, जय किसान' से सहज ही पता लगाया जा सकता है। शांति से लेकर युद्ध जैसी परिस्थितियों में कोई इंसान कैसे स्थितप्रज्ञ की तरह देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, यह हमें उनसे सीखना चाहिए। राजनीतिक शुचिता का अगर किसी ने कीर्तिमान स्थापित किया है तो वह लाल बहादुर शास्त्री ही हैं। आज अगर एक व्यक्ति कोई छोटा-सा पद भी प्राप्त कर लेता है तो चारों ओर ढिंढोरा पीट देता है। जब वह रेल मंत्री बने तब उन्होंने अपनी मां तक को केवल यह बता रखा था कि वे रेलवे में काम करते हैं ताकि उनकी मां कभी किसी की सिफारिश लेकर न आए। 1956 में जब महबूबनगर में एक रेल दुर्घटना हुई तो लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री के नाते नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सार्वजनिक जीवन में इस तरह के सिद्धांत अब दुर्लभ हो गए हैं।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद अपनी साफ और ईमानदार छवि के कारण ही वह भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। मात्र 18 माह के अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उन्होंने वह कर दिया जो अनेक राजनेता कई वर्षों में भी नहीं कर पाते हैं। तीन वर्ष पहले ही चीन से युद्ध हार चुके देश की सेना का मनोबल बढ़ाकर अपनी सूझ-बूझ से 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध जीत लेना उनके कुशल नेतृत्व का ही कमाल था। वह भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान समझौते के लिए ताशकंद गए, पर फिर कभी हमारे बीच नहीं लौटे। उनके विचार, उनके सिद्धांत, उनकी सादगी, उनकी सहजता का आलोक आज भी हमारे देश की राजनीति को प्रकाशित कर रहा है।

Published on:
02 Oct 2024 08:56 pm
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