पिछले कुछ सालों में छापे बहुत कम पड़े हैं और उनमें भी दोषियों पर सजा की मार कम ही हुई। ऐसा इसलिए भी क्योंकि बीज केंद्रों पर प्रभावी निगरानी नहीं होने पर संबंधित एजेंसियां लापरवाही का ठीकरा किसानों पर ही थोपते रहे हैं।
नकली बीजों की वजह से आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव झेल रहे किसानों को राहत देने के लिए कानूनी प्रावधान मजबूत किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार जो बीज विधेयक लाने की तैयारी कर रही है उसमें नकली बीज बेचने पर अब 30 लाख तक जुर्माना और तीन साल की सजा का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, बीजों की कीमतों और क्वालिटी पर भी सरकार का नियंत्रण रहेगा। इस प्रावधान से बीज कंपनियां किसानों से मनमाने दाम नहीं वसूल पाएंंगी। नकली बीजों के साथ-साथ नकली खाद की समस्या नई नहीं है।
बीज उत्पादकों की ओर से किसानों को जिन बीजों की आपूर्ति की जाती है उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होने से यह समस्या और बढ़ती जा रही है। पिछले पांच सालों में भारत में नकली बीजों के कारण ढाई लाख से अधिक किसान प्रभावित हुए हैं। फसल की बर्बादी से मानसिक तनाव के चलते किसानों के आत्महत्या करने के मामले भी सामने आते रहे हैं। सच तो यह है कि किसी भी एक वर्ष में फसलों की बर्बादी होती है तो काश्तकार को उसके दुष्परिणाम आगामी चार-पांच सालों तक झेलने पड़ते हैं। कर्ज का बोझ बढ़ता है सो अलग।
देश का कोई हिस्सा ऐसा नहीं जहां नकली खाद-बीज का कारोबार नहीं होता हो। सरकार लोकसभा में भी स्वीकार कर चुकी है कि वर्ष 2024-25 में जांचे गए 2.5 लाख नमूनों में से 32525 बीज नमूने नकली पाए गए। बड़ी मात्रा में बाजारों में नकली खाद-बीज पहुंचता है, इसका कोई हिसाब ही नहीं। किसान को जब पैदावार से हाथ धोना पड़ता है तब जाकर उसे ठगी का अहसास होता है।
महाराष्ट्र में नकली कपास बीजों की वजह से बर्बाद होने वाले किसानों का मामला हो चाहे आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान या मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों में छापामारी के दौरान बरामद हुए नकली खाद-बीज का मामला, हर जगह कानून के कमजोर प्रावधान दोषियों को बचाते रहे हैं। हर साल हजारों परिवार इस समस्या से बिखर जाते हैं, क्योंकि फसल नष्ट होने से कर्ज बढ़ता है और घर टूट जाते हैं।
चिंता की बात यह भी है कि पिछले कुछ सालों में छापे बहुत कम पड़े हैं और उनमें भी दोषियों पर सजा की मार कम ही हुई। ऐसा इसलिए भी क्योंकि बीज केंद्रों पर प्रभावी निगरानी नहीं होने पर संबंधित एजेंसियां लापरवाही का ठीकरा किसानों पर ही थोपते रहे हैं। नकली बीजों की शिकायत पर सिर्फ 20-30 प्रतिशत मामलों में ही कार्रवाई इसका सबूत है।
असली मुद्दा किसानों की रक्षा है। कानून बनाना ही काफी नहीं, सरकार को इसकी पालना में भी सख्ती दिखानी होगी। ऐसा नहीं हुआ तो कृषि और किसानों पर मंडरा रहे संकट का मुकाबला आसान नहीं होगा। साथ ही, पारदर्शी जांच व्यवस्था, त्वरित मुआवजा तंत्र और दोषियों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित कर ही किसानों का भरोसा बहाल किया जा सकता है।