ओपिनियन

प्रथम ग्रासे

प्रथम ग्रासे मक्षिका पात- पहले ही गास में मक्खी आ गिरी। अब खाओ तो खाओ कैसे। कला केन्द्र के मामले में ऐसा ही हुआ। सारी दुनिया से छांट-छांट के फोटुएं इक_ा की। एक से एक धुरन्धर। 

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Nov 25, 2015
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प्रथम ग्रासे मक्षिका पात- पहले ही गास में मक्खी आ गिरी। अब खाओ तो खाओ कैसे। कला केन्द्र के मामले में ऐसा ही हुआ। सारी दुनिया से छांट-छांट के फोटुएं इक_ा की। एक से एक धुरन्धर। इतनी प्रतिभा इतने से कला केन्द्र में समाएगी कैसे।

इतने से हमारा मतलब है इतने कम बजट वाले केन्द्र में। जिस कलाकार को लेकर बेचारी सरकार सांसत में पड़ गई उसकी एक कलाकृति की कीमत ही पूरे कला केन्द्र के एक साल के बजट से ज्यादा होगी। लेकिन हमें कौन उन्हें यहां बिठा कर पूजना था।

साल में एक बार 'एहसानÓ की तरह आते। आकर अपनी ऊंची-ऊंची राय दे जाते। फिर कला जाने या कला केन्द्र के चलाने वाले। बेचारे स्थानीय कलाकार अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को रोते रहते। अब आप ही बताइए एक मिट्टी के कारीगर के सामने अचानक एक भारी-भरकम भाटे का शिल्प रख दिया जाए तो वह क्या करेगा।

हालांकि जानकारों का कहना है जो कला जितनी स्थानीय होती है वह उतनी ही अन्तरराष्ट्रीय भी हो जाती है। पर यहां तो सीधे अन्तरराष्ट्रीय कला स्थानीय पर थोपने का खेल चालू है। कला केन्द्र के मामले में तो लगता है कि मरुभूमि में कोई योग्य कलाकार ही नहीं बचा जो लाल भाटे से बनी इमारत को सुरुचिपूर्ण तरीके से चलाने के सुझाव दे सके।

और सुझाव दिये भी जाए तो क्या जरूरी है कि उन्हें माना जाए। बादशाह अकबर को 'तानसेनÓ चाहिए। हमारी समझ से तो कला मिट्टी से उपजती है, हवाई जहाज से नहीं उतरती। यह बात अलग है कि मिट्टी का कलाकार ही एक दिन आकाश में जा बैठता है और फिर उसे अपनी कला के सामने दूसरे की कला सुहाती ही नहीं।

कला में भी एक अजीब तरह की तानाशाही चलती है और हमारी इस बात को आप परखना चाहते हैं तो अट्ठारहवीं शताब्दी के एक महान रचनाकार निकोलाई गोगोल की प्रसिद्ध कहानी पढ़ डालिए। आपकी आंखों के सामने गैस के हण्डा जल उठेगा जिसकी रोशनी में आप घमण्डी कलाकार के चरित्र को बखूबी देख सकेंगे।

राज्य के बाशिन्दे कलाकार, गायक, चित्रकार, शिल्पकार, संगीतकार, बड़ी हसरत से इंतजार कर रहे थे कि चलो अब कुछ तो होगा। कला केन्द्र पहली बार नौकरशाही के चंगुल से बाहर निकल रहा है अब तो स्थानीय कलाकारों की कद्र होगी।

लेकिन यहां तो मामला ही अन्तरराष्ट्रीय है। ऐसा लग रहा है कि घर का जोगी जोगणा और आन गांव का सिद्ध। बेचारे कलाकारों की किस्मत में पहले भी टुकुर-टुकुर ताकना लिखा है पहले वे सरकारी अफसर को ताका करते थे और अब तीसरे आसमान में उड़ते 'हंसोंÓ को ताकेंगे। पहले वाले पकड़ में तो थे अब वाले तो मिलेंगे ही नहीं। जय कला केन्द्र की।
- राही

मिट्टी का कलाकार ही एक दिन आकाश में जा बैठता है और फिर उसे अपनी कला के सामने दूसरे की कला सुहाती ही नहीं।
Published on:
25 Nov 2015 02:41 am