
भारत में खेती कभी केवल अन्न पैदा करने की प्रक्रिया नहीं रही। यह प्रकृति को पढऩे, संसाधनों को समझने और अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की एक जीवंत परंपरा रही है।किसान ने मौसम के संकेतों से लेकर मिट्टी की प्रकृति तक को समझा, पानी की हर बूंद का महत्व जाना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बीज, फसल और खेती की पद्धतियां विकसित कीं। यह ज्ञान किसी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि खेतों में पीढिय़ों के अनुभव से विकसित हुआ। आज वही कृषि एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां परंपरागत अनुभव के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, सेंसर, रिमोट सेंसिंग, जैव प्रौद्योगिकी और डेटा आधारित कृषि जैसी अत्याधुनिक तकनीकें जुड़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव, बदलती उपभोक्ता जरूरतें और वैश्विक बाजार की प्रतिस्पर्धा कृषि के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। ऐसे समय में कृषि शिक्षा के सामने मूल प्रश्न है कि क्या हम नई पीढ़ी को सिर्फ नई तकनीक सिखा रहे हैं या उसे भारतीय कृषि के उस ज्ञान से भी जोड़ रहे हैं, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं? नई कृषि शिक्षा का रास्ता 'परंपरा बनाम विज्ञान' नहीं, बल्कि परंपरा और विज्ञान के सार्थक संगम से होकर जाता है।
आज कृषि की सफलता का पैमाना केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। किसान की आय, उत्पादन लागत, जल और मृदा संरक्षण, जलवायु-अनुकूलता, पोषण सुरक्षा, बाजार तक पहुंच और मूल्यवर्धन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए कृषि शिक्षा को भी खेत की बदलती वास्तविकताओं के साथ बदलना होगा। कृषि महाविद्यालयों से निकलने वाला युवा केवल नौकरी तलाशने वाला स्नातक न हो, बल्कि समस्या पहचानने, वैज्ञानिक समाधान विकसित करने और उसे उद्यम में बदलने वाला कृषि पेशेवर बने- यही नई कृषि शिक्षा की वास्तविक कसौटी है।
भारत में कृषि शिक्षा का व्यापक तंत्र इस परिवर्तन के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में कृषि, कृषि अभियांत्रिकी, पशु विज्ञान, मत्स्य विज्ञान, बागवानी, खाद्य प्रौद्योगिकी और अन्य संबद्ध विषयों में शिक्षा और अनुसंधान का विस्तार हुआ है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थानों की शिक्षा बदलती कृषि अर्थव्यवस्था, किसानों की वास्तविक जरूरतों और भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के साथ और अधिक गहराई से जुड़े। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक बहुविषयक, कौशल-आधारित और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार दिया है। कृषि शिक्षा में भी पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन और सीखने के परिणामों पर अधिक जोर दिया जा रहा है। पाठ्यक्रम में बदलाव तभी सार्थक होगा, जब उसका संबंध खेत से भी मजबूत हो।
कृषि विद्यार्थी को सिर्फ फसल उत्पादन नहीं, बल्कि फसल से खाद्य उत्पाद तक व खेत से बाजार तक मूल्य-शृंखला को समझना होगा। आने वाले समय में सोच 'फार्म टू मार्केट' से आगे बढ़कर 'फार्म टू वैल्यू' की होनी चाहिए। इसी तरह कृषि शिक्षा में उद्यमिता को केंद्रीय स्थान देना समय की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों को केवल डिग्री नहीं, बल्कि समस्या को अवसर और विचार को उद्यम में बदलने का कौशल देना होगा। नई कृषि शिक्षा का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम डिजिटल परिवर्तन है। तकनीक का वास्तविक मूल्य तभी है, जब विद्यार्थी यह समझे कि उसे खेत की वास्तविक समस्या के समाधान में कैसे और कहां उपयोग करना है। भारत की अगली कृषि क्रांति केवल खेत में नहीं होगी, उसका एक महत्वपूर्ण आधार कक्षा, प्रयोगशाला और खेत के बीच बनने वाले नए ज्ञान-संबंध में तैयार होने वाली पीढ़ी होगी। यह पीढ़ी यदि भारतीय पारंपरिक ज्ञान की गहराई को आधुनिक विज्ञान की शक्ति और नई तकनीक की संभावनाओं से जोड़ सके, तो कृषि शिक्षा केवल बदलती खेती का अनुसरण नहीं करेगी- वह भारत की कृषि के अगले दौर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।यही नई कृषि शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए- जड़ों से जुड़ा ज्ञान, विज्ञान से समर्थित दृष्टि, तकनीक से सक्षम सोच और भविष्य को गढऩे का कौशल।
डॉ. यशपाल सिंह मलिक, (उप महानिदेशक, कृषि शिक्षा आइसीएआर)