यह पीढ़ीगत परिवर्तन जितना आकर्षक प्रतीत होता है, उसकी असली कसौटी इस बात में है कि क्या नया नेतृत्व अपने व्यापक जनादेश को ठोस संरचनात्मक परिवर्तन में बदल पाता है। चुनौती केवल शासन संचालन की नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की भी है।
के.एस. तोमर, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक,
लेखक 1992-1998 तक नेपाल में कार्यरत रहे हैं।
नई पीढ़ी के असंतोष और एक मधेशी नेता के उभार की पृष्ठभूमि में बालेंद्र शाह का नेपाल की सत्ता के शिखर तक पहुंचना महज सामान्य सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ है। यह पीढ़ीगत परिवर्तन जितना आकर्षक प्रतीत होता है, उसकी असली कसौटी इस बात में है कि क्या नया नेतृत्व अपने व्यापक जनादेश को ठोस संरचनात्मक परिवर्तन में बदल पाता है। चुनौती केवल शासन संचालन की नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की भी है। सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से नहीं, बल्कि उन अपेक्षाओं से है, जो उपलब्धियों से कहीं आगे निकल जाती हैं। नेपाल में जो घटित हुआ है, वह एक राजनीतिक परिवर्तन से बढ़कर लगभग एक सभ्यतागत पुनर्संतुलन जैसा प्रतीत होता है।
मधेश के मैदानों से आने वाले और जनकपुर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े बालेंद्र शाह का शीर्ष पद तक पहुंचना उस ऐतिहासिक वर्चस्व को चुनौती है, जो लंबे समय तक पहाड़ी अभिजात वर्ग और उससे पहले राणा शासन के हाथों में केंद्रित रहा। तराई से उभरे नेता का सत्ता के केंद्र में पहुंचना उन जड़ जमाए ढांचों से निर्णायक विच्छेद का संकेत है, जिन्होंने मधेशी समाज को हाशिए पर रखा। सत्ता परिवर्तन का प्रतीकात्मक पक्ष भी उल्लेखनीय रहा। डिजिटलीकरण और प्रशासनिक सुधार जैसे शुरुआती संकेत यह दर्शाते हैं कि नई सरकार स्वयं को नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रही है। फिर भी, इस व्यापक जनादेश के साथ चुनौतियों की जटिलता भी समान रूप से उपस्थित है।
जन अपेक्षाओं का प्रबंधन: सबसे तात्कालिक चुनौती जनता की ऊंची अपेक्षाओं को संभालने की है। शाह उस युवा वर्ग की उपज हैं, जो धीमी गति के सुधारों को स्वीकार नहीं करता। यह वर्ग कम समय में शासन, सेवाओं, रोजगार और भ्रष्टाचार नियंत्रण में ठोस सुधार चाहता है। ढिलाई विश्वसनीयता को क्षीण कर सकती है।
जड़ें जमा चुका भ्रष्टाचार: नेपाल की प्रशासनिक व राजनीतिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार एक संरचनात्मक समस्या रहा है। भ्रष्टाचार के जाल को तोडऩा केवल इच्छाशक्ति का नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार का प्रश्न है। खरीद-प्रक्रिया, नौकरशाही और राजनीतिक वित्तपोषण में बदलाव कठिन और समयसाध्य होंगे। प्रारंभिक प्रतीकात्मक कदम अपेक्षाएं बढ़ा सकते हैं, पर वास्तविक सुधार धीमे व जटिल होंगे।
कमजोर अर्थव्यवस्था का पुनर्जीवन: नेपाल की अर्थव्यवस्था संरचनात्मक रूप से कमजोर है और विदेशों से आने वाले धन पर अत्यधिक निर्भर है। इससे उपभोग तो चलता है, पर घरेलू उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ती। उद्योग सीमित हैं, बुनियादी ढांचा अधूरा व निवेश अस्थिर है। नई सरकार के समक्ष उपभोग-आधारित व्यवस्था को उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था में बदलने की चुनौती है।
बेरोजगारी और पलायन: बेरोजगारी व विदेश पलायन नेपाल की सामाजिक-आर्थिक समस्या का केंद्र हैं। बड़ी संख्या में युवा रोजगार के लिए विदेश जाते हैं, जिससे देश की आर्थिक ऊर्जा कमजोर होती है। देश के भीतर रोजगार सृजन की अपेक्षा बहुत ऊंची है, लेकिन इसके लिए उद्योग और सेवा क्षेत्रों का दीर्घकालिक विस्तार आवश्यक होगा।
राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना: नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिर सरकारों व बदलते गठबंधनों से प्रभावित रही है। बहुमत के बावजूद, नई राजनीतिक शक्ति के भीतर एकता बनाए रखना और विपक्ष के साथ संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण होगा। आंदोलन से निकली शक्तियां अक्सर शासन के दौरान आंतरिक विरोधाभासों से जूझती हैं।
भारत-चीन के बीच संतुलन: नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे भारत-चीन के बीच संतुलन साधने के लिए बाध्य करती है। परंपरागत रूप से काठमांडू ने संतुलित विदेश नीति अपनाई है। नई सरकार के सामने 'नेपाल प्रथम' दृष्टिकोण को लागू कर दोनों देशों के साथ संतुलन बनाने की परीक्षा होगी।
संस्थागत और प्रशासनिक सुधार : सबसे महत्वपूर्ण चुनौती संस्थागत सुधार की है। नेपाल की संस्थाएं जड़ता और सीमित क्षमता से जूझती रही हैं। वादों को लागू करने के लिए गहरे प्रशासनिक सुधार, तकनीकी आधुनिकीकरण और जवाबदेही व्यवस्था विकसित करनी होगी।
भारत के लिए अवसर : भारत के लिए यह परिवर्तन एक अवसर लेकर आया है। के. पी. शर्मा ओली के दौर में संबंधों में तनाव रहा। नई सरकार के संतुलित दृष्टिकोण से विश्वास बहाली, आर्थिक सहयोग और जन-स्तर के संबंधों को मजबूत करने का अवसर उत्पन्न हुआ है।
चीन की रणनीतिक पुनर्समीक्षा: चीन के लिए भी यह बदलाव पुनर्विचार का संकेत है। वैचारिक निकटता के स्थान पर अब आर्थिक सहयोग और अवसंरचना निवेश के माध्यम से प्रभाव बनाए रखने की रणनीति अपनाई जा सकती है। बालेंद्र शाह का उदय केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक और क्षेत्रीय बदलाव का संकेत है। यह परिवर्तन स्थायी रूप लेगा या पुरानी व्यवस्थाओं के बोझ तले दब जाएगा- यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व घरेलू सुधारों और बाहरी संतुलन को कितनी कुशलता से साधता है।