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इलाज जारी या मुक्ति: कठिन भावनात्मक फैसला

जीवन के अंतिम चरण से जुड़े संवाद अब भी नियमित चिकित्सा अभ्यास का हिस्सा नहीं बन पाए हैं, क्योंकि प्रशिक्षण, कानूनी स्पष्टता और सामाजिक स्वीकार्यता सीमित हैं। ऐसे में कई निर्णय समय के दबाव में लिए जाते हैं, जहां मरीज की इच्छाओं को समझ पाना हमेशा आसान नहीं होता।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 31, 2026

डॉ. अश्वनी पाराशर, बाल रोग विशेषज्ञ ( पीजीआइ चंडीगढ़ )

आइसीयू में समय अलग तरह से चलता है। मशीनों की लगातार चलती आवाज, मॉनिटर पर धीमी होती लकीरें और बीच में एक ऐसा शरीर जो जीवित है, पर जीवन से लगभग अनुपस्थित जैसे सब कुछ होते हुए भी कुछ भी शेष न हो। 2013 की एक शाम 20 वर्षीय हरीश राणा एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए और उसके बाद 13 वर्षों तक 'पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' में रहे, एक ऐसी अवस्था जहां शरीर जीवित रहता है, लेकिन व्यक्ति को अपने आसपास की दुनिया का कोई बोध नहीं होता। न कोई प्रतिक्रिया, न कोई संवाद सिर्फ मशीनों के सहारे चलती सांसें। अंतत: उनके माता-पिता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, ताकि उन्हें जीवन-रक्षक उपकरणों से मुक्त किया जा सके और प्रकृति को अपना रास्ता लेने दिया जाए। लेकिन यह केवल एक परिवार का निर्णय नहीं था, यह उस बड़े प्रश्न की दस्तक थी- क्या जीवन केवल धड़कन और सांस का नाम है या उसमें गरिमा का भी स्थान है?

इच्छामृत्यु को सामान्यत: दो रूपों में समझा जाता है, सक्रिय व निष्क्रिय। सक्रिय इच्छामृत्यु में जीवन समाप्त करने के लिए प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया जाता है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन-रक्षक उपचार को रोक दिया जाता है। भारत में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित शर्तों के साथ स्वीकार किया गया है। दरअसल यह 'मृत्यु का अधिकार' नहीं, बल्कि 'इलाज से इनकार करने का अधिकार' है और यही अंतर इस पूरी बहस को संवेदनशील बनाता है। चिकित्सा विज्ञान ने मृत्यु को हराया नहीं है, उसने उसे टालना सीख लिया है। हमारी तकनीक जीवन को लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम हो गई है, लेकिन हमेशा उसे अर्थपूर्ण नहीं बना पाती। कई बार इलाज जीवन की गुणवत्ता नहीं, बल्कि केवल उसकी अवधि बढ़ाता है। दुनियाभर में स्वास्थ्य खर्च का एक बड़ा हिस्सा जीवन के अंतिम महीनों में होता है, जब चिकित्सा केवल समय जोड़ रही होती है, जीवन नहीं।

भारत में कुल स्वास्थ्य खर्च का एक बड़ा हिस्सा करीब 40-47% अब भी लोगों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है और देश में औसतन 2-3 आइसीयू बेड प्रति एक लाख आबादी पर उपलब्ध हैं, ऐसे में यह निर्णय केवल चिकित्सकीय नहीं, बल्कि आर्थिक और संरचनात्मक भी बन जाता है। किसी अपने को इस स्थिति में देखना और फिर यह तय करना कि उपचार जारी रखा जाए या नहीं, यह गहरी भावनात्मक परीक्षा है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की बात करता है, जिसे न्यायालय ने 'गरिमा के साथ मृत्यु' तक विस्तारित किया है। लेकिन जब रोगी स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता, तब यह प्रश्न और जटिल हो जाता है- कौन तय करेगा? परिवार, डॉक्टर या न्यायालय? 2023 में प्रक्रिया को सरल बनाए जाने के बाद भी देश में 'लिविंग विल' की अवधारणा व्यावहारिक रूप से लगभग अनुपस्थित है। अक्सर परिवार ऐसे निर्णय पहली बार उसी क्षण लेते हैं, जब स्थिति पहले ही नियंत्रण से बाहर हो चुकी होती है।

हम जीवन की योजना बनाते हैं, पर मृत्यु की नहीं। यहीं एक और गहरा प्रश्न उभरता है- जब कोई व्यक्ति बोल नहीं सकता, तब हम उसके वर्तमान नहीं, उसके अतीत से सहमति ढूंढते हैं। उसके पुराने विचारों, जीवनशैली और उसकी कल्पित इच्छाओं के आधार पर निर्णय लेते हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में उसकी इच्छा होती है या हमारी व्याख्या? जीवन के अंतिम चरण से जुड़े संवाद अब भी नियमित चिकित्सा अभ्यास का हिस्सा नहीं बन पाए हैं, क्योंकि प्रशिक्षण, कानूनी स्पष्टता और सामाजिक स्वीकार्यता सीमित हैं। ऐसे में कई निर्णय समय के दबाव में लिए जाते हैं, जहां मरीज की इच्छाओं को समझ पाना हमेशा आसान नहीं होता। दुनिया के कई देशों ने इस जटिल प्रश्न को अलग-अलग तरीकों से संबोधित किया है। जहां इच्छामृत्यु कानूनी है, वहां भी यह सामान्य विकल्प नहीं है। उदाहरण के लिए, कनाडा की आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार 2023 में कुल मौतों का लगभग 4.7त्न ऐसे मामलों से जुड़ा था, जबकि नीदरलैंड में यह आंकड़ा लगभग 5त्न के आसपास है।

भारत में समस्या का एक बड़ा हिस्सा नीति और व्यवस्था के स्तर पर है। 'इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट' की ओर से जारी 'क्वालिटी ऑफ डेथ इंडेक्स' में भारत को 80 देशों में 67वां स्थान मिला था। कई अस्पतालों में अभी तक स्पष्ट प्रोटोकॉल नहीं हैं, जिससे ऐसे निर्णय हर बार जटिल प्रक्रिया बन जाते हैं। हमारा स्वास्थ्य तंत्र जीवन बचाने के लिए बना है, जीवन के अंत को संभालने के लिए अभी उस स्तर तक विकसित नहीं हुआ है। शायद इस बहस का उत्तर कानून से पहले व्यवस्था में छिपा है, जैसा कि कई देशों के अनुभव भी बताते हैं जहां पेलिएटिव केयर सुलभ हो, परिवारों को सहारा मिले और जीवन के अंतिम चरण पर संवाद समय रहते शुरू हो सके। एक ओर वह मृत्यु है, जहां व्यक्ति अपने प्रियजनों के बीच शांतिपूर्वक विदा होता है और दूसरी ओर वह जहां मशीनों और प्रक्रियाओं के बीच उसकी पहचान धीरे-धीरे खो जाती है। शायद हर धड़कन जीवन नहीं होती और हर अंत पराजय नहीं होता, कभी-कभी यह लंबे ठहरे हुए जीवन से स्वाभाविक मुक्ति भी हो सकता है। अंतत: यह बहस मृत्यु के बारे में कम और इस बारे में अधिक है कि क्या केवल जीवन को बनाए रखना ही पर्याप्त है, यदि उसमें गरिमा शेष न रहे।