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संपादकीयः माता-पिता से किनारा करना संतानों का अक्षम्य अपराध

कोई भी माता-पिता अत्याचार के हद से ज्यादा बढ़ जाने पर ही अपने मामले को सार्वजनिक करने का कदम उठाते हैं। सामान्य, थोड़े-बहुत और सहने योग्य अन्याय की स्थिति में तो वे बच्चों के अपराध को ढकने की ही कोशिश करते हैं।

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बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर की कमाई लगाने वाले माता-पिता वक्त पडऩे पर जब खुद संतान की उपेक्षा का शिकार होकर बेसहारा हो जाएं तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। स्वार्थी रवैया व धनलोलुपता के इस दौर में आज की पीढ़ी के बच्चों में माता-पिता के प्रति खोती जा रही संवेदनाओं को लेकर चिंता लंबे समय से जताई जा रही है। माता-पिता के अनादर, उपेक्षा और उन्हें बेघर तक कर देने की समस्या के समाधान की दिशा में तेलंगाना सरकार के कदम की सराहना की जानी चाहिए। तेलंगाना विधानसभा में हाल ही सर्वसम्मति से पारित हुआ पैरेंटल सपोर्ट बिल-2026 ऐसे ही कुछ सुधार का खाका लिए हुए है। बिल में हालांकि माता-पिता की उपेक्षा के समूचे मुद्दे को न लेकर केवल उनकी देखभाल से किनारा करने की बच्चों की प्रवृत्ति पर अंकुश को ध्यान में रखा गया है।

चिंता इस बात की भी है कि माता-पिता को संरक्षण के तमाम प्रावधानों के बावजूद संतानों की ओर से उनकी उपेक्षा के समाचार आए दिन सामने आते हैं। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने बुजुर्गों की मदद के लिए जो हेल्पलाइन बनाई हुई हैं, उनमें हर साल हजारों की संख्या में इन शिकायतों से जुड़े प्रकरण दर्ज हो रहे हैं। इन प्रकरणों का गंभीर पहलू यह है कि इनमें 60-70 प्रतिशत मामले संतान की ओर से की जा रही उपेक्षा और उनके अत्याचार से जुड़े हुए हैं। इस सामाजिक वर्जना को समझना होगा कि कोई भी माता-पिता अत्याचार के हद से ज्यादा बढ़ जाने पर ही अपने मामले को सार्वजनिक करने का कदम उठाते हैं। सामान्य, थोड़े-बहुत और सहने योग्य अन्याय की स्थिति में तो वे बच्चों के अपराध को ढकने की ही कोशिश करते हैं। इसका अर्थ है कि असल प्रकरणों की संख्या प्रशासनों के स्तर पर दर्ज होने वाले मामलों से कहीं ज्यादा है।

मुद्दे की गंभीरता तो इससे भी समझी जा सकती है कि तेलंगाना ऐसा चौथा राज्य है, जिसने वर्ष 2007 से लागू केंद्र सरकार के 'माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण अधिनियम' के बावजूद इस दिशा में कुछ कदम बढ़ाया है। इससे पहले केरल, असम और मध्य प्रदेश केंद्र के अधिनियम में कुछ न कुछ जोड़ चुके हैं। नए और अतिरिक्त प्रावधान जोडऩे की नौबत इसलिए आ रही है कि अधिनियम के प्रावधान और इनका क्रियान्वयन कहीं न कहीं अनदेखे छोड़े जा रहे बुजुर्गों के साथ पूरा न्याय नहीं कर पा रहे हैं। इस बात पर भी विचार करना होगा कि क्या जोड़े गए प्रावधान काफी हैं? सिर्फ दस हजार रुपए मासिक जुर्माने से तो स्थिति नहीं सुधर सकती। ऐसे बच्चों के लिए कड़ी सजा के प्रावधान जोडऩे होंगे। माता-पिता से किनारा करना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इस समस्या का समाधान सामाजिकता का दायरा बढ़ाकर ही हो सकेगा। इसके लिए नई पीढ़ी की संवेदनाओं को झकझोरना होगा। साथ ही उनमें माता-पिता के सम्मान के भाव का बीजारोपण करना होगा। नैतिकता का पाठ पढ़ाना होगा।