
रंजना मिश्रा, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार
साहित्य जगत में भारत का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार माना जाता है। वर्ष 2025 के लिए 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा हाल ही की गई है। इस बार यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्रसिद्ध तमिल कवि, गीतकार और उपन्यासकार आर. वैरामुथु को प्रदान किया गया है। यह घोषणा न केवल तमिल साहित्य प्रेमियों के लिए बल्कि पूरे भारतीय साहित्य जगत के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक क्षण है, क्योंकि लगभग 24 वर्षों के एक लंबे अंतराल के बाद किसी तमिल रचनाकार को यह गौरव प्राप्त हुआ है। उनसे पहले केवल दो तमिल लेखकों, अखिलन को 1975 में और जयकांतन को 2002 में, इस सम्मान से नवाजा गया था।
वैरामुथु पहले ऐसे तमिल साहित्यकार हैं, जिन्हें मुख्य रूप से उनकी 'कविताओं' के लिए यह पुरस्कार दिया गया है, जबकि इससे पहले के दोनों विजेताओं को उनके गद्य साहित्य के लिए सम्मानित किया गया था। यह सम्मान साबित करता है कि कविता आज भी समाज की भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। आर. वैरामुथु को यह पुरस्कार उनके साहित्य में किए गए आजीवन और उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है। 13 जुलाई 1953 को तमिलनाडु के थेनी जिले के एक छोटे से गाँव में जन्मे वैरामुथु का लेखन प्रकृति, ग्रामीण जीवन, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने महज 18 साल की उम्र में अपना पहला कविता संग्रह प्रकाशित कर दिया था।
अपने चार दशक से अधिक लंबे कॅरियर में उन्होंने 37 से अधिक किताबें लिखी हैं। उनका सबसे चर्चित उपन्यास 'कल्लिक्काट्टु इतिहासम' है, जिसके लिए उन्हें साल 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। यह उपन्यास वैगई बांध के निर्माण के कारण विस्थापित हुए किसानों के दर्द, उनके संघर्ष और अपनी जमीन से उखडऩे की पीड़ा को बेहद मार्मिक ढंग से दर्शाता है। उनकी रचनाएं समाज के उस हाशिए पर खड़े वर्ग की आवाज बनती हैं, जिन्हें अक्सर विकास की आंधी में भुला दिया जाता है। साहित्य के अलावा, तमिल सिनेमा की दुनिया में भी उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने 8,000 से अधिक फिल्मी गीत लिखे हैं और सर्वश्रेष्ठ गीतकार के रूप में सात बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता है। उन्हें अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक सेवाओं के कारण भारत सरकार की ओर से 2003 में 'पद्म श्री' और 2014 में 'पद्म भूषण' से भी सम्मानित किया जा चुका है।
ज्ञानपीठ पुरस्कार को भारतीय साहित्य का 'नोबेल पुरस्कार' भी कहा जाता है। इसकी स्थापना साल 1961 में उद्योगपति साहू शांति प्रसाद जैन और उनकी पत्नी रमा जैन द्वारा स्थापित 'भारतीय ज्ञानपीठ' ट्रस्ट द्वारा की गई थी। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार साल 1965 में मलयालम के प्रसिद्ध कवि जी. शंकर कुरुप को उनके कविता संग्रह 'ओदक्कुझल' (बांसुरी) के लिए दिया गया था। वहीं, इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला लेखिका बंगाली साहित्यकार आशापूर्णा देवी थीं, जिन्हें 1976 में यह सम्मान मिला था। समय के साथ इस पुरस्कार के नियमों में भी बदलाव हुए हैं। साल 2013 में अंग्रेजी भाषा को भी इस पुरस्कार की सूची में शामिल कर लिया गया और 2018 में अमिताभ घोष ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले अंग्रेजी लेखक बने। ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चयन प्रक्रिया और पात्रता बहुत ही स्पष्ट और पारदर्शी होती है।
यह पुरस्कार सिर्फ भारतीय नागरिकों को दिया जाता है जो भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से किसी एक में या अंग्रेजी में उत्कृष्ट साहित्य की रचना करते हैं। साल 1981 तक यह पुरस्कार लेखक की किसी एक विशेष कृति या किताब के लिए दिया जाता था, लेकिन 1982 के बाद से इसे लेखक के 'संपूर्ण साहित्यिक योगदान' के लिए दिया जाने लगा। ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का एक बहुत बड़ा उत्सव है। 2025 के 60वें ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता के रूप में आर. वैरामुथु का चयन इस बात का सटीक उदाहरण है कि साहित्य समाज के हर वर्ग, विशेषकर ग्रामीण और विस्थापित लोगों की आवाज कैसे बन सकता है। उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि किस तरह पारंपरिक सोच और आधुनिक दृष्टिकोण का सुंदर मेल शब्दों के माध्यम से किया जा सकता है।
यह पुरस्कार न केवल वैरामुथु की निजी उपलब्धि है, बल्कि यह तमिल भाषा की हजारों साल पुरानी और समृद्ध साहित्यिक विरासत का भी एक बड़ा सम्मान है। भारत में, जहां हर राज्य की अपनी अलग साहित्यिक परंपरा है, ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसी संस्थाएं इन सभी भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने का काम करती हैं व आने वाली पीढिय़ों के रचनाकारों को भी बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।
Published on:
31 Mar 2026 02:20 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
