राजस्थान सरकार ने घाटे में चल रहे जयपुर के खासाकोठी और उदयपुर के आनंद भवन होटल को बंद करने का फैसला कर लिया।
- गोविन्द चतुर्वेदी
राजस्थान सरकार ने घाटे में चल रहे जयपुर के खासाकोठी और उदयपुर के आनंद भवन होटल को बंद करने का फैसला कर लिया। चलेंगे आगे भी वहां होटल ही पर उन्हें प्राइवेट लोग चलाएंगे। ये दोनों ही इमारतें शहर के बीचों-बीच हैं। रियासत काल में आज से करीब-करीब सौ साल पहले की बनी हैं। इनकी अपनी ‘हेरिटेज वैल्यू’ है, जिसके कारण देश के होटल उद्योग के सूरमाओं की इन पर नजर है। आज से नहीं ३०-४० सालों से। इन सालों में कम से कम आधा दर्जन मौकों पर वे गंभीर प्रयास कर चुके। ऐसे प्रयास कि, अब बिकी-अब बिकी। पर जितना दम बेचने की कोशिश करने वालों में था, उतना ही रोकने वालों में।
उनका तर्क भी यह था कि जो सम्पत्ति सरकार ने बनाई नहीं, राजा-महाराजाओं ने बनाई और आजादी के बाद जनता के लिए समर्पित कर दी, उसे सरकार कैसे बेच सकती है? इसी तर्क से पत्रिका की मुहिम के चलते जयपुर का गवर्नमेंट हॉस्टल बिकने से बच गया। आज वहां पुलिस कमिश्नरेट है। तब आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि, खासाकोठी और आनंद भवन क्यों बिकने चाहिए? क्यों लीज पर जाने चाहिए? वे जनता की सम्पत्ति हैं तो उनमें राज्य की जनता के लिए उपयोगी कोई सुविधा शुरू होनी चाहिए। जैसे जयपुर में बच्चों का एक जेकेलॉन अस्पताल है। उसकी बिल्डिंग भी उद्योग समूह ने बना कर दी। राज्यभर से बच्चे यहां जान बचाने आते हैं। ३५ साल में, बच्चों का दूसरा कोई अस्पताल शहर में नहीं बना। तब खासाकोठी और उसके आस-पास के क्षेत्र को जोडक़र यहां बच्चों का कोई अस्पताल क्यों नहीं खोल दिया जाता।
यह जरूरत इसलिए और भी ज्यादा है कि, आजादी के ७० साल बाद भी राजस्थान में सालाना ७० हजार नवजात मां के गर्भ से बाहर आकर भी जिंदा नहीं बच पा रहे। बच्चों के जितनी ही जरूरत शहर में महिलाओं के एक और अस्पताल की भी है। अभी दो अस्पताल हैं। एक जनाना अस्पताल तो १९३१ में तब के राजा ने शुरू किया। दूसरा महिला चिकित्सालय भी शुरू तो ९५ साल पहले हो गया। फिर बंद होकर १९८७ में दोबारा खुला। इन दोनों में भी राज्यभर से गंभीर मामले आते हैं। जगह कम पड़ती है। तब इसमें महिला चिकित्सालय भी खुल सकता है।
सरकार चाहे तो आस-पास की सरकारी जमीन को जोडक़र यहां दोनों ही अस्पताल खोल सकती है। रेलवे स्टेशन और बस स्टेण्ड करीब होने से बाहर के मरीजों को भी लाभ होगा। यही हाल उदयपुर का है। वहां महिलाओं का एक पन्नाधाय अस्पताल है। वो भी १९५६ में बना। बच्चों का एक बाल चिकित्सालय है, जो १९९५ में बना। शहर की आबादी भी बढ़ रही है। संभाग की आबादी भी एक करोड़ से ज्यादा है। तब दोनों ही तरह के अस्पतालों की जरूरत वहां भी खूब है। अस्पतालों के साथ-साथ सरकार चाहे तो यहां स्कूल-कॉलेज खोलने पर भी सोच सकती है। जयपुर में तो पिछले सालों में सरकार ने कई पुराने स्कूलों को बंद किया है। सरकारी कॉलेज तो जयपुर में खुले ही बरसों हो गए। महिलाओं का तो एक महारानी कॉलेज है।
वह भी ७५ साल पुराना। इतनी सारी जरूरतों के बीच खासाकोठी और आनंद भवन को बेचने या लीज पर देने से सरकार को भले कुछ करोड़ मिल जाएं, जैसे दिल्ली के बीकानेर हाऊस को देने पर मिले, पर जनता को कुछ नहीं मिलने वाला। वैसे भी सरकार मुनाफा कमाने के लिए तो है नहीं। वह जनता की सेवा के लिए है। जनता की सेवा इसी में है कि, इन दोनों जगहों पर उसके फायदे का काम हो। उन दोनों के कर्मचारियों की रोजी-रोटी का इन्तजाम बना रहे।