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Green Hospitals India: चिकित्सा संस्थानों का पर्यावरण सम्मत न होना बन रहा चुनौती

दुर्भाग्यवश, कुछेक अपवाद को छोड़ कोई भी अस्पताल अपने प्रचार-प्रसार में गर्व के साथ पर्यावरण सम्मत होने का दावा नहीं करता।

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Feb 23, 2026

डॉ. विवेक एस. अग्रवाल - पर्यावरण से जुड़े विषयों के जानकार,

बीते दशकों में इंसान को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाने के लिए बाजार की मांग के चलते चिकित्सकीय संस्थानों की तेज गति से हो रही संख्यात्मक वृद्धि के बीच इनका पर्यावरण सम्मत ना होना नई चुनौती के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। हालांकि कुछ नियम और बंदिशों के चलते प्रदूषण नियंत्रण हेतु कदम उठाए जा रहे हैं, किंतु उस बाबत अनुपालना अभी भी अत्यंत सीमित या ना के बराबर ही है। यह कदम भी स्वत: स्फूर्त हों ऐसा नहीं है। सामान्यतया, उठाए गए कदमों का मूल उद्देश्य अनुपालना की पूर्ति मात्र तक सीमित रहता है।

सरकारी योजनाओं के लाभ, निजी क्षेत्र में इलाज की प्राथमिकता एवं व्यवसायिक दृष्टिकोण के चलते अस्पतालों के घनत्व में वृद्धि शहरों तक सीमित ना रह ग्रामीण परिवेश में भी निरंतर बढ़ती जा रही है। यह दृढ़ आशंका है कि अस्पताल प्रदूषण के नवीन केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। इसके लिए अस्पताल ही दोषी हों ऐसा नहीं है, मरीज और परिजनों का पर्यावरण संबंधी सरोकार नहीं होना भी समान रूप से उत्तरदायी है।

सभी के जहन में मात्र इलाज का ध्येय ही रहता है, पर्यावरण संबंधी प्रश्न तो किसी भी स्तर पर उभर कर आते ही नहीं हैं। इस संदर्भ में यदि नियमों की अनुपालना का विश्लेषण भी किया जाए तो वह बड़े या कॉर्पोरेट अस्पतालों तक ही सीमित पाई जाती है। अन्य अस्पतालों द्वारा गैर-तार्किक रूप से प्रदूषण नियंत्रण हेतु कदमों को नकार दिया जाता है।

यदि इसकी पृष्ठभूमि से जुड़ी मानसिकता का अध्ययन करें तो वह ठीक उसी प्रकार होती है, जैसे दुपहिया पर जीवन रक्षा हेतु नहीं अपितु ट्रैफिक पुलिस से बचने मात्र के लिए हेलमेट का उपयोग। अस्पताल प्रशासन द्वारा पर्यावरण संबंधी परिवर्तन अथवा ढांचे को अतिरिक्त व्ययभार के रूप में ही समझा जाता है। साथ ही, इस बाबत किसी भी संरचना अथवा साधन को उपलब्ध संसाधनों हेतु अनौचित्यपूर्ण भी समझा जाता है।

अस्पतालों के भवन निर्माण एवं संचालन स्वीकृति हेतु पर्यावरण के तय मानदंडों का पालन अनिवार्य होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, कुछेक अपवाद को छोड़ कोई भी अस्पताल अपने प्रचार-प्रसार में गर्व के साथ पर्यावरण सम्मत होने का दावा नहीं करता। यह अपेक्षित है कि चिकित्सालय अपने संचालन के दौरान नेट जीरो, अर्थात किसी भी प्रकार के ठोस या तरल अपशिष्ट के सम्पूर्ण निष्पादन की नीति का निर्माण कर उसे अंजाम दे।

यह तभी संभव है जब संचालक स्तर पर उत्तरदायी सेवाप्रदाता की अनिवार्यता हो। विडंबना तो यह है कि संचालकों हेतु अस्पताल में पर्यावरण तो दूर, मूलभूत मानदंड जैसे दो बिस्तरों के मध्य न्यूनतम दूरी (विशेष तौर पर सरकारी कल्याण योजना वाले वार्ड में), जल एवं वायु गुणवत्ता, खुली जगह आदि भी खास महत्व नहीं रखती।

पर्यावरण हेतु परिवर्तन को वित्तीय लागत के आधार पर नकार दिया जाता है। लेकिन, बेहतर वातावरण कायम करने हेतु डिस्पोजेबल के स्थान पर बार-बार उपयोग किए जाने वाले संसाधनों के साथ, मशीन की उचित एवं नियमित मरम्मत, भोजन व्यवस्था में सुधार, पानी की बर्बादी पर उपयुक्त साधनों के उपयोग से रोक, कचरे का पूर्ण पृथक्करण, पैकेजिंग मटेरियल में बदलाव जैसे कुछ छोटे एवं दूरगामी उपाय उपलब्ध हैं, जिनसे कम लागत में तात्कालिक रूप से बदलाव परिलक्षित होगा।

इन सुधारों से पर्यावरण संबंधी उपायों के महंगे होने का मिथक भी टूट सकेगा। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तार्किक उपयोग से अस्पताल परिसर एवं उसकी परिधि में उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन का निरंतर मापन एवं उसके घन क्षेत्र में संक्रमण का आंकलन किया जा सकता है। संभवतया, उक्त विश्लेषण से सुधारात्मक उपायों को निरंतर एवं बेहतर दिशा भी उपलब्ध होगी।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए अस्पतालों के उत्पन्न कचरे को निस्तारित कर देने मात्र से उत्पन्न समस्या का हल नहीं होगा। इस बाबत समग्रता के साथ संरचनात्मक बदलाव करते हुए शून्य अपशिष्ट के सिद्धांत को विधिक रूप से आवश्यक करना होगा। अस्पतालों के मध्य पर्यावरण सम्मत होने की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को विकसित करने के साथ, नीतिगत स्तर पर इस बाबत बहस के साथ नीति निर्माण की आवश्यकता है।

Published on:
23 Feb 2026 04:14 pm
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