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तेल की राजनीति के बीच बदल रहा वैश्विक ऊर्जा संतुलन

यही कारण है कि ईरान, वेनेजुएला जैसे देशों पर दबाव बनाया जाता है। यह दबाव आर्थिक भी होता है और राजनीतिक भी, ताकि ये देश अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने के बजाय अमरीका के प्रभाव में काम करें।

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कुमार सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार- आज की दुनिया में ऊर्जा सिर्फ बिजली या पेट्रोल-डीजल भर नहीं रह गई है, बल्कि यह ताकत, राजनीति और भविष्य की दिशा तय करने का सबसे बड़ा साधन बन चुकी है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों को इसी नजरिये से समझना जरूरी है। पहली नजर में यह तेल की वापसी का सवाल लगता है, लेकिन असल में यह उस पकड़ को बनाए रखने की कोशिश है, जो अमरीका लंबे समय से वैश्विक व्यवस्था पर बनाए हुए है। ट्रंप की सोच में तेल सिर्फ एक आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि नियंत्रण का साधन है। उनका यह कहना कि उन्हें 'ईरान का तेल लेना पसंद है', केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक सोच का संकेत है। इसके मायने ये है कि वे केवल तेल निकालना नहीं चाहते, बल्कि यह तय करना चाहते हैं कि तेल किस रास्ते से गुजरेगा, किसे मिलेगा और किस कीमत पर बिकेगा। यही कारण है कि ईरान, वेनेजुएला जैसे देशों पर दबाव बनाया जाता है। यह दबाव आर्थिक भी होता है और राजनीतिक भी, ताकि ये देश अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने के बजाय अमरीका के प्रभाव में काम करें।

दुनिया इस समय ऊर्जा के बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2024 में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो जीवाश्म ईंधनों से अधिक है। यह बदलाव केवल पर्यावरण की चिंता के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक कारणों से भी हो रहा है क्योंकि अब स्वच्छ ऊर्जा कई मामलों में सस्ती और टिकाऊ साबित हो रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बात करें तो 2023 में दुनियाभर में लगभग 1.4 करोड़ गाडिय़ां बिकीं, जो कुल कार बिक्री का करीब 18 प्रतिशत था। 2025-26 तक इनकी हिस्सेदारी 20 प्रतिशत के पार पहुंचती नजर आ रही है। ट्रंप की नीतियां बदलाव के उलट दिशा में जाती दिखती हैं। वे जलवायु नीतियों को कमजोर करते हैं, पवन ऊर्जा जैसी परियोजनाओं को रोकते हैं और तेल-गैस उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही वे अन्य देशों पर दबाव डालते हैं कि वे अमरीकी गैस खरीदें। यह साफ संकेत है कि उनका लक्ष्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना है। ईरान के साथ बढ़ता तनाव केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि ऊर्जा मार्गों और वैश्विक आपूर्ति पर नियंत्रण की लड़ाई है।

होर्मुज स्ट्रेट जैसे रास्तों से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। लेकिन इस रणनीति का एक उल्टा असर भी है। जब भी तेल आपूर्ति में खतरा बढ़ता है, देश वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढऩे लगते हैं। जिस नीति के जरिये तेल की अहमियत बढ़ाने की कोशिश की जाती है, वही नीति लंबे समय में तेल की निर्भरता कम करने का कारण भी बन जाती है। भारत इस पूरे परिदृश्य में महत्वपूर्ण लेकिन जटिल स्थिति में खड़ा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में थोड़ी-सी भी बढ़ोतरी का असर सीधे महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। दूसरी ओर, भारत ने भविष्य की तैयारी भी शुरू कर दी है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है। उसे एक तरफ आज की जरूरतों के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करनी है, दूसरी तरफ भविष्य के लिए साफ और टिकाऊ विकल्पों में निवेश बढ़ाना है। भू-राजनीतिक स्तर पर भी भारत को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। अमरीका, रूस और मध्य-पूर्व तीनों के साथ संबंध बनाए रखना उसकी जरूरत है। ऐसे में ट्रंप जैसी नीतियां भारत के लिए स्थिति को और जटिल बना देती हैं।

वैश्विक स्तर पर देखें तो बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं। चीन हरित तकनीकों में तेजी से आगे बढ़ रहा है और उत्पादन से लेकर बाजार तक अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। अमरीका का तेल के सहारे अपनी ताकत बनाए रखने का प्रयास बदलती दुनिया के खिलाफ एक संघर्ष जैसा लगता है। यह एक तरह से पुराने और नए रास्तों के बीच खींचतान है एक तरफ वह पुराना मॉडल है जो तेल और गैस पर टिका है, और दूसरी तरफ वह नया रास्ता है जो स्वच्छ ऊर्जा की ओर जा रहा है। ट्रंप की नीतियां पहले रास्ते को बचाने की कोशिश करती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया धीरे-धीरे दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ रही है। यह बदलाव धीमा जरूर है, लेकिन लगातार और गहरा है। भारत जैसे देशों के लिए यही समय सबसे अहम है। अगर सही नीतियां अपनाई जाएं, तो यह बदलाव अवसर बन सकता है। भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकता है। लेकिन अगर निर्णयों में देरी हुई या केवल पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बनी रही, तो आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि तेल की वापसी वास्तव में वापसी नहीं है, बल्कि एक कोशिश है पुरानी व्यवस्था को बचाने की। असली सवाल यह नहीं है कि तेल का दौर खत्म होगा या नहीं, बल्कि यह है कि आने वाले समय की ऊर्जा व्यवस्था किसके नियंत्रण में होगी और उसमें भारत अपनी जगह कैसे तय करेगा।