16 अप्रैल 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संपादकीय: नाम के सम्मान में ही बच्चों के आत्मविश्वास की नींव

लेकिन कुछ मामलों में जाने-अनजाने में ऐसे नाम भी रख दिए जाते हैं, जिनके अर्थ नकारात्मक होते है या समय के साथ उपहास का कारण तक बन जाते हैं।

2 min read
Google source verification

भारतीय समाज में नाम केवल पहचान का ही माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक होता है। कई बार नामकरण धार्मिक आस्था, जातीय पहचान या स्थानीय परंपराओं के आधार पर किया जाता है। लेकिन कुछ मामलों में जाने-अनजाने में ऐसे नाम भी रख दिए जाते हैं, जिनके अर्थ नकारात्मक होते है या समय के साथ उपहास का कारण तक बन जाते हैं। स्कूली शिक्षा के दौर से ही ऐसे नाम बच्चों के आत्मविश्वास पर असर डाल सकते हैं और उन्हें सामाजिक असहजता का सामना करना पड़ सकता है।

राजस्थान में सरकार की ओर से स्कूली बच्चों के सार्थक नाम सुनिश्चित करने की पहल निश्चय ही एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को छूने वाली है। जिसके तहत स्कूल रिकॉर्ड में उन बच्चों के नाम बदले जा सकेंगे, जिनके नाम का अर्थ अनुपयुक्त, अस्पष्ट या उपहास का कारण बन सकता है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य बच्चों को भविष्य में शर्मिंदगी से बचाना और उन्हें अपने नाम के अर्थ से जुड़ाव महसूस कराना है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि नाम बदलने से पहले अभिभावकों की सहमति अनिवार्य होगी। यदि किसी बच्चे को उसके नाम के कारण मानसिक या सामाजिक दबाव झेलना पड़ रहा है, तो उसे बदलने का विकल्प देना निस्संदेह सराहनीय कदम है। इससे बच्चों में आत्मसम्मान की भावना मजबूत हो सकती है और वे अपनी पहचान को लेकर अधिक सहज महसूस कर सकते हैं। यह पहल समाज को भी यह संदेश देती है कि नाम केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि किसी के भी व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, भारत जैसे विविध भाषाओं और संस्कृतियों वाले देश में एक नाम का अर्थ अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है। जो नाम एक समुदाय में सामान्य है, वही दूसरे समुदाय में अजीब या अनुचित लग सकता है। ऐसे में यह तय करना कि कौन-सा नाम उपयुक्त है और कौन-सा नहीं, एक जटिल प्रक्रिया हो सकती है। इसके लिए जरूरी होगा कि अभिभावकों और बच्चों को नाम का सही अर्थ समझाया जाए।

दूसरा अहम पहलू अभिभावकों के अधिकार और भावनाओं से जुड़ा है। संतान का नामकरण माता-पिता के लिए निजी निर्णय होता है। हालांकि सरकार ने सहमति को अनिवार्य बताया है, फिर भी यह जरूरी है कि इस प्रक्रिया में किसी प्रकार का दबाव या सामाजिक संकोच न हो। अभिभावकों को पूरी स्वतंत्रता और पर्याप्त जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे सोच-समझकर निर्णय ले सकें।ऐसे में इस पहल को संवेदनशीलता और सावधानी के साथ लागू करना आवश्यक है। इस तरह की पहल देश के अन्य राज्यों में भी लागू की जा सकती है, ताकि बड़े होने पर नाम के कारण उन्हें कहीं भी शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े। इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी पारदर्शिता, स्वैच्छिकता व सांस्कृतिक समझ के साथ लागू किया जाता है।