कुलिश जी ने वन्यजीव संरक्षण के आंदोलन को हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया और राजस्थान पत्रिका के पहले पृष्ठ को आंदोलन के समाचारों के लिए समर्पित कर दिया। उस समय देश में ऐसे पक्षियों की जानकारी लोगों को कम ही हुआ करती थी।
सत्तर के दशक में गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) प्रजाति के पक्षियों का गैरकानूनी शिकार होता था। अरब के शहजादे बाजों के जरिए पक्षियों का शिकार करने जैसलमेर आया करते थे। पड़ताल के बाद जब वन मंत्री से इसकी शिकायत की तो उन्होंने मामले से निगाह फेरने और चुप रहने की हिदायत दी तो हमने जन आंदोलन का निर्णय लिया।
बिना किसी अखबार की मदद के यह संभव नहीं था तो कर्पूर चन्द्र कुलिश जी से मिले। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण के आंदोलन को हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया और राजस्थान पत्रिका के पहले पृष्ठ को आंदोलन के समाचारों के लिए समर्पित कर दिया। मेरे साथी विश्वम्भर मोदी इस अभियान में अग्रणी बने रहे।
उस समय देश में ऐसे पक्षियों की जानकारी लोगों को कम ही हुआ करती थी। ऐसे में देश के छह राज्यों में इन पक्षियों का सर्वेक्षण करने के लिए जाना था। पैसे की कमी भी रहा करती थी। टूरिज्म एंड वाइल्ड लाइफ सोसायटी ऑफ इंडिया की बैठक में कुलिश जी ने अपना बटुआ उल्टा कर सारे रुपए मेज पर उड़ेल दिए और वन्यजीव संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता भी की। सर्वेक्षण से लौटने के बाद कुलिश जी के परामर्श से मैंने कई लेख लिखे, जो पत्रिका में प्रकाशित हुए।
जब गोडावण की प्रजातियों पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया तो वन विभाग और अन्य लोगों ने मेरे विचार की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि ऐसा कैसे संभव है। तब कुलिश जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- काम जारी रखो। सम्मेलन में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) पर डाक विभाग के जरिए एक डाक टिकट का प्रकाशन करना तय हुआ, जिसका लोकार्पण हमने कुलिश जी के हाथों कराया, जो उस समय सरकारी पक्ष को काफी अखरा था। इस सम्मेलन के बाद जब मैंने 'बस्टर्ड इन डिक्लाइन' पुस्तक लिखी तो कुलिश जी का लेख प्रमुख रूप से शामिल किया। इस पुस्तक की बिक्री से सोसायटी का खर्च कई साल तक चलता रहा। वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर हमारी मुहिम में कुलिश जी का सहयोग लगातार बना रहा। वे इस सोसायटी के अध्यक्ष भी रहे।
वन्यजीवों के प्रति कुलिश जी की संवेदनशीलता प्रशंसनीय थी। वर्ष 1992 में वे ब्राजील में हुए विश्व पर्यावरण सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले देश के पहले संपादक रहे। केवलादेव राष्ट्रीय पार्क में साइबेरियन क्रेन पर ट्रांसमीटर लगाने का प्रोजेक्ट था। अमरीकी सरकार ने इस कार्य के लिए मुझे प्रभारी बनाया था, लेकिन वन मंत्रालय में बात आगे नहीं बढ़ रही थी। मेरे आग्रह पर कुलिश जी ने तत्कालीन केंद्रीय वन मंत्री राजेश पायलट से बात की और मुझे उनके पास भेजा। मंत्री से मुलाकात के कुछ ही देर में अनुमति मिल गई और वन्यजीव संरक्षण के लिए यह अनूठा प्रयोग बिना व्यवधान सम्पन्न किया जा सका।
प्राचीन वेद आधारित प्रकृति संरक्षण के लिए वे सदैव मुखर रहते थे। सरकारी वार्षिक पौधरोपण पर उनकी टिप्पणी बेबाक हुआ करती थी। उनका कहना था कि आप पौधा जरूर तो लगा सकते हो, लेकिन आपको पता होना चाहिए कि जमीन कौनसा पौधा पनपा सकेगी। उनका कथन- 'याद रहे आप जंगल दोबारा से नहीं पैदा कर सकोगे' आज सही साबित हो रहा है। आज के संदर्भ में उनके विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनकी स्मृति में एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक पुस्तक लिखी जा सकती है।
(लेखक चार दशक से वन्यजीव व पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं।)