डॉ. राहुल मेहरा यूनेस्को ग्लोबल हेल्थ एंड एजुकेशन चेयर के भारतीय प्रतिनिधि हमारी सांसें, हमारा पानी और हमारे बचपन में बनी आदतें, हमारे स्वास्थ्य और जीवन की दिशा तय करती हैं। लेकिन, दिल्ली-एनसीआर के लाखों बच्चों के लिए वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य चिंता का विषय बन गया है। दिल्ली के साथ-साथ भारत के कई शहरों में […]
डॉ. राहुल मेहरा
यूनेस्को ग्लोबल हेल्थ एंड एजुकेशन चेयर के भारतीय प्रतिनिधि
हमारी सांसें, हमारा पानी और हमारे बचपन में बनी आदतें, हमारे स्वास्थ्य और जीवन की दिशा तय करती हैं। लेकिन, दिल्ली-एनसीआर के लाखों बच्चों के लिए वर्तमान पर्यावरणीय परिदृश्य चिंता का विषय बन गया है। दिल्ली के साथ-साथ भारत के कई शहरों में खराब होती वायु गुणवत्ता और बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं ने अस्पतालों से लेकर कक्षाओं तक एक तात्कालिक कदम की आवश्यकता को जन्म दिया है। इन स्वास्थ्य संकटों से लडऩे का सबसे सशक्त साधन स्वास्थ्य शिक्षा है। यह शिक्षा महज शारीरिक स्वास्थ्य की जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आज की स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए तैयार करने और उनके बेहतर भविष्य की नींव रखने का माध्यम है। दुनिया के कई शहरों, जैसे डलास और डेट्रॉइट में बच्चे साफ हवा में सांस लेते हैं और सुरक्षित वातावरण में रहते हैं। दिल्ली के बच्चों को भी यही अधिकार क्यों न मिले? पर्यावरण नीतियां जरूरी हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब बच्चों में जागरूकता और सही आदतें विकसित होंगी। और यह बदलाव स्कूलों से ही शुरू हो सकता है।
स्वास्थ्य शिक्षा क्यों है महत्त्वपूर्ण: स्वास्थ्य शिक्षा केवल जीव विज्ञान के पाठ या सफाई की टिप्स तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी शिक्षा है, जो छात्रों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बनाती है। सोचिए, एक ऐसी पीढ़ी के बारे में, जो पोषण के महत्त्व को समझती है, तनाव को सही तरीके से प्रबंधित कर सकती है और शांतिपूर्ण तरीके से विवाद सुलझा सकती है। ऐसी पीढ़ी केवल जीवित नहीं रहती, बल्कि उन्नति करती है। तरंग हेल्थ एलायंस ने हरियाणा, एनसीआर और जयपुर के 30 स्कूलों में एक पायलट प्रोग्राम लागू किया है। स्वास्थ्य शिक्षा का यह पाठ्यक्रम कक्षा 6 से 8 के छात्रों के लिए लागू किया गया है। इसका प्रभाव बेहद सकारात्मक रहा है। बच्चे बेहतर खानपान का चुनाव करना सीख रहे हैं, शिक्षकों ने कक्षाओं में सुधार देखा है और अभिभावक घर पर जागरूकता बढऩे की बात कह रहे हैं। ये केवल पाठ नहीं हैं, बल्कि खुशहाल और स्वस्थ जीवन जीने की कला है।
बदलाव का दृष्टिकोण: भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के उद्देश्य, जो समग्र विकास पर जोर देते हैं, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि स्वास्थ्य को स्कूलों के पाठ्यक्रम में एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहिए। फिर भी, स्वास्थ्य शिक्षा को अक्सर एक पूरक विषय के रूप में देखा जाता है। स्वास्थ्य शिक्षा उतना ही महत्त्वपूर्ण विषय होना चाहिए, जितना गणित और विज्ञान हैं।
व्यापक प्रभाव: स्वास्थ्य शिक्षा केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं है, यह समाज को बदलने की क्षमता रखती है। शोध बताते हैं कि प्रारंभिक स्वास्थ्य शिक्षा से पुरानी बीमारियों की दर में कमी आ सकती है, जिससे स्वास्थ्य देखभाल की लागत कम होगी और राष्ट्रीय उत्पादकता में सुधार होगा। इसके अलावा, यह 'स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत' और 'विकसित भारत' के उद्देश्यों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। मिलकर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर बच्चा, चाहे वह किसी भी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से हो, एक स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण में सीखने, बढऩे और प्रगति करने का अवसर पा सके। शिक्षा में किया गया निवेश सबसे शक्तिशाली है। इसे स्वास्थ्य के साथ जोड़ा जाना चाहिए। ऐसा करके हम न केवल अपने बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करेंगे, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र भी बनाएंगे जो सशक्त, जागरूक और आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार हो।