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महाशक्तियों को प्रतिस्पर्धा से पहले समझदारी दिखानी होगी

भविष्य में यह आशंका भी है कि कोई बेहद शक्तिशाली एआइ, जो इंसानों की मंशा के मुताबिक काम न करे, पूरी मानवता के लिए नुकसानदेह बन जाए। इसलिए दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों अमरीका और चीन को इन खतरों पर सीधे बात करनी ही होगी। बातचीत का मतलब यह नहीं कि दोनों एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करना छोड़ देंगे।

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-जैक सुलिवन लेखक अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बाइडेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हैं (प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

नवंबर 2024 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहली बार एक संयुक्त वक्तव्य में यह कहा कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का फैसला मशीन या एआइ नहीं, बल्कि इंसानों को ही करना चाहिए। यह बात सुनने में कूटनीतिक तौर पर बेहद सहज और स्वाभाविक लग सकती है, क्योंकि शायद ही कोई विवेकशील व्यक्ति यह तर्क देगा कि परमाणु हथियारों का नियंत्रण एआइ के हवाले कर दिया जाए, लेकिन चीन जैसे देश के साथ सुरक्षा मामलों पर सहमति बनना इतना आसान नहीं होता।

चीन अक्सर अमरीका के ऐसे सुझावों पर संदेह करता है और रूस भी पहले इसी तरह की बातों का विरोध कर चुका है। इसलिए अमरीका और चीन के बीच एआइ और परमाणु सुरक्षा पर बातचीत होना पहले से तय नहीं था। इस एक छोटे-से साझा बयान तक पहुंचने में भी एक साल से ज्यादा का समय लग गया। फिर भी यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे यह सिद्ध हुआ कि एआइ के क्षेत्र में तीव्र प्रतिस्पर्धा के बीच भी दोनों महाशक्तियां एआइ से जुड़े खतरों पर साथ बैठकर बात कर सकते हैं। इससे पहले भी दोनों देशों के राजनयिक एवं विशेषज्ञ जनवरी, 2024 में जिनेवा में एआइ जोखिमों पर केंद्रित एक लंबी बैठक कर चुके थे। आज आम लोगों के रोजमर्रा के इस्तेमाल में या सैन्य क्षेत्र में एआइ बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में अमरीका और चीन दोनों को एआइ के जोखिमों पर लगातार बातचीत करनी होगी, भले ही वे एआइ में आगे निकलने की होड़ में क्यों न हों। ऐसा इसलिए जरूरी है, क्योंकि एआइ के खतरे असली हैं और समय के साथ बढ़ते जा रहे हैं। जैसे-जैसे एआइ ज्यादा ताकतवर होगा, गैर सरकारी समूह या आतंकी संगठन भी इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर सेनाएं एआइ पर ज्यादा निर्भर हो जाएंगी और फैसले बहुत तेजी से होने लगेंगे तो किसी गलती या गलत संकेत से बड़ा सैन्य टकराव भी हो सकता है। अगर कड़े सुरक्षा इंतजाम न हों तो बैंकिंग और शेयर बाजार में एआइ के ज्यादा इस्तेमाल से बड़ा आर्थिक संकट भी पैदा हो सकता है।

भविष्य में यह आशंका भी है कि कोई बेहद शक्तिशाली एआइ, जो इंसानों की मंशा के मुताबिक काम न करे, पूरी मानवता के लिए नुकसानदेह बन जाए। इसलिए दुनिया की दो सबसे बड़ी एआइ शक्तियों अमरीका और चीन को इन खतरों पर सीधे बात करनी ही होगी। बातचीत का मतलब यह नहीं कि अमरीका और चीन एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करना छोड़ देंगे। हाल में चीन ने यह दिखा भी दिया, जब उसने माइक्रोचिप और एआइ बनाने में जरूरी दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर सख्त रोक लगाई। बाइडेन सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहते हुए, मेरा प्रयास था कि एआइ में अमरीका आगे रहे, ताकि यह तकनीक हमारे खिलाफ नहीं, बल्कि हमारे फायदे में काम करे। साफ था कि सैन्य, खुफिया और व्यापारिक क्षेत्रों में एआइ को लेकर मुकाबला और तेज होगा। लेकिन यही तीखी प्रतिस्पर्धा बताती है कि बातचीत क्यों जरूरी है। अगर अमरीका और चीन बिना आपस में बात किए एआइ की दौड़ में आगे बढ़ते रहे, तो यह बहुत गैर-जिम्मेदाराना होगा। एआइ न सिर्फ खतरे लाता है, बल्कि जलवायु संकट और स्वास्थ्य जैसी वैश्विक समस्याओं के समाधान के मौके भी देता है और इन पर भी बातचीत जरूरी है। दोनों देशों के विशेषज्ञों ने सरकार से बाहर होने वाली 'ट्रैक-2' बातचीत में हिस्सा लिया है, जो कि उपयोगी है। लेकिन अंत में सरकार-से-सरकार की सीधी बातचीत का कोई विकल्प नहीं है, चाहे वह शुरुआत में सीमित ही क्यों न हो। कई लोग एआइ की तुलना परमाणु हथियारों से करते हैं। तुलना कुछ हद तक सही है, क्योंकि बड़ी ताकतों को खतरनाक तकनीकों की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। शीत युद्ध के दौर में भी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते हुए थे। लेकिन एआइ अलग है और इसे संभालना ज्यादा मुश्किल है। परमाणु हथियारों की गिनती और निगरानी आसान थी। एआइ में एल्गोरिद्म गिनना और उनकी पूरी क्षमता समझना बहुत कठिन है। परमाणु ऊर्जा में नागरिक और सैन्य उपयोग अलग-अलग साफ दिखते हैं, लेकिन एआइ का वही सिस्टम जो शोध और विकास में मदद करता है, खतरनाक हथियार भी बना सकता है।

एआइ का खतरा सिर्फ देशों के बीच नहीं, बल्कि आतंकियों व गलत दिशा में काम करने वाली एआइ प्रणालियों से भी है। अमरीका में तो एआइ का विकास सरकार नहीं, बल्कि कई निजी कंपनियां कर रही हैं। इसलिए जोखिम कम करने की बातचीत में ज्यादा लोगों को शामिल करना होगा। एआइ कितनी तेजी से व कितनी दूर तक जाएगा, इस पर भी सबकी राय अलग-अलग है। कोई इसे धीरे-धीरे अपनाई जाने वाली तकनीक मानता है, तो कोई कहता है कि बेहद ताकतवर एआइ जल्द आ जाएगा। परमाणु हथियारों में कम-से-कम यह पता था कि वे क्या कर सकते हैं, एआइ के मामले में तस्वीर अभी साफ नहीं है। परमाणु हथियार नियंत्रण भी एक दिन में नहीं बना था- उसे विकसित करने और बनाए रखने में दशकों लगे। एआइ के मामले में हम अभी शुरुआत में हैं। जोखिम कम करने की कोशिशें अभी से शुरू हों, देर करने का मतलब खतरे को बढ़ाना होगा।