
-अजीत रानाडे वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)
पहली फरवरी को वित्त मंत्री केंद्रीय बजट ऐसे व्यापक आर्थिक परिदृश्य में प्रस्तुत करेंगी, जिस पर दुनिया के कई देश ईर्ष्या कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे प्रमुख संस्थानों ने भारत की विकास दर अनुमान बढ़ाए हैं। तिमाही जीडीपी आंकड़ों में भी तेजी के संकेत हैं। उपभोक्ता महंगाई दर उल्लेखनीय रूप से नीचे आ गई है- भारतीय रिजर्व बैंक के 'कंफर्ट बैंड' से भी कम। तेज विकास और कम महंगाई का यह मेल 'गोल्डीलॉक्स अर्थव्यवस्था' कहलाता है। यह एक ऐसा 'मीठा अहसास' है, जिसमें सब संतुलित प्रतीत होता है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना स्वाभाविक है कि व्यापक आर्थिक प्रबंधन दुरुस्त है और नीति-निर्माताओं का काम केवल मौजूदा रफ्तार को बनाए रखना है लेकिन यही धारणा सबसे बड़ा जोखिम भी है।
यह तस्वीर सतही तौर पर आकर्षक जरूर है, लेकिन इसके भीतर असमानताएं छिपी हैं। इसलिए इस तस्वीर को और गहराई से पढऩे की जरूरत है। इसलिए नहीं कि शीर्षक आंकड़े गलत हैं, बल्कि इसलिए कि इन्हें जन्म देने वाली शक्तियां असमान हैं, जो पलट भी सकती हैं और समावेशी समृद्धि की ओर ले जाने वाले विकास से पूरी तरह मेल नहीं खातीं। इसलिए बजट में इस मौजूदा स्थिति को राहत का बहाना नहीं, बल्कि बुनियाद मजबूत करने का अवसर मानना चाहिए। पहला सवाल मौजूदा 'कम महंगाई' को समझने का है। अक्टूबर 2025 में महंगाई दर मात्र 0.25 प्रतिशत थी। इस तेज गिरावट का बड़ा कारण खाद्य कीमतें हैं, जो अक्टूबर 2024 में दोहरे अंकों की महंगाई से एक साल बाद शून्य से नीचे, यानी माइनस पांच प्रतिशत तक पहुंच गईं। चूंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में भोजन अधिक वजनदार वस्तु है, इसलिए समग्र महंगाई नीचे दिखाई देती है। यह स्थिति बताती है कि खाद्य महंगाई पर कृषि मूल्य चक्र, आपूर्ति की स्थितियां और कमजोर अंतर्निहित मांग हावी हैं, लेकिन भोजन और ईंधन को छोड़कर 'कोर' महंगाई अब भी लगभग चार प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। यह स्थिति कमजोर मांग और कृषि मूल्य चक्रों की ओर संकेत करती है।
खेतिहर कीमतों में ठहराव से उपजी महंगाई की गिरावट स्थायी होगी, यह मान लेना जोखिम भरा अनुमान होगा। दूसरा अहम पहलू कृषि मजदूरी और ग्रामीण आय का है। खाद्य कीमतों में गिरावट सीपीआइ को तो नीचे लाती है, लेकिन किसानों और खेतिहर मजदूरों की आय पर दबाव बढ़ाती है। इसलिए कम खाद्य महंगाई के साथ ग्रामीण संकट का सह-अस्तित्व असंभव नहीं है, क्योंकि खाद्य उत्पादकों को इसका प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल पाता। बजट के संदर्भ में यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि तेज विकास की विश्वसनीयता व्यापक और संतुलित मांग पर टिकी होती है। यदि ग्रामीण आय और मजदूरी ठहरी रहती हैं, तो उपभोग कमजोर बना रहेगा। जब उपभोग कमजोर होगा, तो निजी निवेश के तेज होने की संभावना भी सीमित हो जाएगी। इसलिए मौजूदा दौर को केवल 'मैक्रो स्थिरता' नहीं, बल्कि असमान विकास के संकेत के रूप में पढ़ा जाना चाहिए- जहां कुछ क्षेत्रों में मजबूती है, तो कुछ में लगातार कमजोरी।
बाहरी मोर्चे पर भी जोखिम कम नहीं हैं। रुपए की कमजोरी और आयातित महंगाई की आशंका बनी हुई है। अभी खाद्य कीमतों की गिरावट और कच्चे तेल की दरों में स्थिरता ने असर को थाम रखा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं है। खेतिहर कीमतें पलट सकती हैं, धातुओं और कीमती धातुओं की कीमतें लागत दबाव बढ़ा सकती हैं और 'बेस इफेक्ट' के कारण अगले वर्ष महंगाई में उछाल दिख सकता है। इसलिए 0-2 प्रतिशत महंगाई को 'न्यू नॉर्मल' मान लेना विवेकपूर्ण नहीं होगा। बजट को व्यावहारिक, संतुलित और दूरदर्शी होना चाहिए। व्यापक आर्थिक मान्यताएं इस समझ के साथ गढ़ी जाएं कि महंगाई सामान्य स्तर, यानी चार प्रतिशत के आसपास लौट सकती है। ग्रामीण आय और रोजगार-सघन विकास को केंद्रीय लक्ष्य बनाया जाए। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय जारी रहे, लेकिन उसका झुकाव रोजगार सृजन की ओर हो। साथ ही यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि कम महंगाई का अर्थ कम जीवन-यापन लागत नहीं होता। इसलिए वित्त मंत्री की असली चुनौती इस क्षण को सही परिप्रेक्ष्य में समझना है। यही अवसर है उन आधारों को मजबूत करने का, जो विकास को समावेशी, टिकाऊ और भरोसेमंद बनाते हैं, ताकि महंगाई का चक्र फिर पलटे, उससे पहले देश की तैयारी पूरी हो।
Published on:
22 Jan 2026 12:56 pm
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