
डॉ. राजेश कुमार व्यास,(संस्कृतिकर्मी, कवि एवं कला समीक्षक)
तीजन बाई पंडवानी गाती नहीं थीं, लोक से जुड़े आलोक को अपने स्वराभिनय में रूपांतरित करती थीं। महाभारत के पात्रों, प्रसंगों और कथा में निहित लोक मर्म की गहरी दृष्टि उनमें थी। इसीलिए उनका गान जीवंत होता दृश्य छटाओं में हममें बसता था। महाभारत वेदव्यास रचित भारत का महाकाव्य है। तीजन बाई ने इस महाकाव्य को अपनी पंडवानी कला में नाटक की तरह मन की आंखों से देखना संभव किया। पंडवानी माने 'पांडवों की वाणी'। तीजन बाई ने लोक ने समाई महाभारत को चाक्षुस रूप प्रदान किया। वह अपने ईजाद रंगीन फुंदनों वाले तानपुरे संग मंच पर चहलकदमी करते, गाती और अभिनय करती तो महाभारत की घटनाएं और पात्र जैसे हमारी आंखों के समक्ष जीवंत हो उठते। तीजन बाई ने कापालिक स्वरूप में पंडवानी को नृत्य नाटिका में अपनी ओजस्वी वाणी से जनप्रिय किया। यह सच है महाभारत के रचयिता वेद व्यास हैं, पर अकेले उनसे ही महाभारत कहां आगे बढ़ी है। लोक ने भी तो अपने मन से महाभारत को गुना और बुना है। तीजन बाई भी जिस 'पारधी' जनजाति समुदाय से आती थीं, उसमें महाभारत कहने की अपनी दृष्टि रही है।
अपने नाना ब्रजलाल परधा से उन्हें इस लोककला की प्रारंभिक शिक्षा मिली। उनसे कथाओं को सुनते तीजन ने उन्हें लोक से जुड़ी भंगिमाओं और दृष्टि में अपने स्तर पर पुनर्नवा किया। अपने तानपुरे संग नृत्य गान और अभिनय की पंडवानी की उनकी आनुष्ठानिक शैली इसलिए भी सदा सुहाती रही है कि वहां पर किसी तरह का कोई बनावटीपन नहीं है। वह जब पंडवानी में 'राजा के राज में रहना है तो हाजिर, हाजिर कहना है' जैसे संवादों के साथ दुशासन वध, द्रोपदी चीर हरण, भीम से जुड़े प्रसंगों को अपनी गर्ज भरी आवाज में सुनाती जो महाभारत अंश रूप में नहीं समग्रता बोध में हममें जैसे बसने लगती है।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण अर्जुन संवाद को अपने नृत्य अभिनय में जींवत करते जिस तरह से वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का अभिनय करती या फिर भीम से जुड़ी कहानियों को सुनाती या फिर शंकर पार्वती संवाद के तहत 'भोलाला पूछे पार्वती' जैसा कुछ गाती तो लगता था, कथा से एकमेक होती वह उसमें प्रवेश कर जाती थी। उनके हाथ का तंबूरा भीम की गदा बन कभी लुभाता तो अर्जुन का धनुष बनकर भी मन को हर्षाता। छत्तीसगढ़ी बोली, लोक मुहावरों और सहज उपजे हास्य की उनकी कला ने महाभारत की कथा को भी सर्वथा नया आयाम देते इसे जनमन से जोड़ा।
वह जब 13 वर्ष की ही थीं, अपनी कला का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। यह वह समय था जब महिलाओं का इस क्षेत्र में आना वर्जित था। पंडवानी पुरुष ही गा सकते थे। उन्होंने इस कला में अपने को इस कदर साधा कि फिर वह इसकी पर्याय ही हो गईं। महाभारत के कथा तत्व में लोक-भावनाओं को जोड़ उसने गायन में किस्सागोई का भी अपना सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। आवाज में गान संग ओजस्वी हुंकार और गर्जन की उनकी शैली इसलिए भी लोकप्रिय हुई कि वहां पर संवेदनाओं का लोक-उजास समाया होता था। श्याम बेनेगल ने अपने धारावाहिक 'भारत एक खोज' में उनके इसी गर्जन का महाभारत से जुड़े प्रसंगों में सुमधुर उपयोग किया। हबीब तनवीर उससे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने वैश्विक मंच पर इस कला प्रोत्साहन के नए अवसर उन्हें दिए। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाटक को अनुकीर्तन कहा गया है। माने जो लिखा गया है, जो हो चुका है, उसकी कला द्वारा मौलिक व्याख्या। इस दीठ से तीजन बाई ने महाभारत का अनुकीर्तन किया। तीजन बाई ने 'पंडवानी' के जरिए शास्त्रीय परंपरा में समाई लोक की सुगंध, उससे जुड़े आलोक से हमें जोड़ा। उनका बिछोह लोक कलाओं से जुड़ी हमारी विरल परंपरा की कड़ी के टूटने जैसा है।