भारत के लिए इस समझौते का असर सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक-रणनीतिक भी है। यह इंडो-पैसिफिक और ओशियानिया क्षेत्र में भारत की आर्थिक मौजूदगी को गहरा करता है और एक उच्च-आय, ओईसीडी अर्थव्यवस्था के साथ नियम-आधारित साझेदारी को मजबूत बनाता है।
-के.एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दिसंबर 2025 में सिर्फ नौ महीनों की बातचीत के बाद सम्पन्न हुआ। यह समझौता उस समय सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था विखंडन, सुस्त बहुपक्षीय वार्ताओं और ठप पड़े बड़े व्यापार समझौतों के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में यह संकेत है कि भारत अब अपने 'विकसित भारत 2047' विजन के अनुरूप, सीमित लेकिन उच्च-गुणवत्ता वाले द्विपक्षीय समझौतों को तरजीह दे रहा है। भले ही द्विपक्षीय व्यापार का आकार अभी छोटा है, लेकिन इस समझौते के रणनीतिक, क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हैं। यह दिखाता है कि भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ सेवाओं, गतिशीलता और विनियामक सहयोग पर आत्मविश्वास के साथ बातचीत कर रहा है, जबकि डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सावधानी से सुरक्षित रखा गया है।
न्यूजीलैंड के लिए यह समझौता दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बड़े बाजारों में व्यवस्थित प्रवेश का अवसर है, हालांकि घरेलू राजनीतिक असहमति इसके भीतर मौजूद असमानताओं को उजागर करती है। आशाओं के बावजूद कई चुनौतियां मौजूद हैं। सबसे पहली चुनौती टैरिफ असमानता की है। न्यूजीलैंड में औसत शुल्क लगभग 2.3 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह करीब 16 प्रतिशत है। ऐसे में भारतीय निर्यातकों को पहले से ही काफी खुला बाजार मिला हुआ था। यदि निर्यात बढ़ाने के लिए आक्रामक प्रचार और कारोबारी नेटवर्क विकसित नहीं किए गए, तो व्यापार में बढ़ोतरी सीमित ही रह सकती है। दूसरी चुनौती राजनीतिक है। आव्रजन प्रावधानों और डेयरी क्षेत्र के बाहर रहने पर न्यूजीलैंड में उठ रहा विरोध, संसद में मंज़ूरी की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकता है। तीसरा, गैर-टैरिफ बाधाएं, मानक पालन और लॉजिस्टिक सीमाएं बड़ी रुकावट हैं। यदि नियामक सहयोग, एसपीएस व्यवस्था और कस्टम सुविधा प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुए, तो टैरिफ में राहत का लाभ व्यावहारिक व्यापार में नहीं बदल पाएगा। अंतत:, एफटीए का लाभ उठाने में भारत की क्षमता पहले भी असमान रही है। जब तक संस्थागत सहायता, एमएसएमई में जागरूकता और घरेलू औद्योगिक नीति के साथ तालमेल न हो, तब तक उपयोग दरें सीमित रहती हैं।
भारत के लिए इस समझौते का असर सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक-रणनीतिक भी है। यह इंडो-पैसिफिक और ओशियानिया क्षेत्र में भारत की आर्थिक मौजूदगी को गहरा करता है और एक उच्च-आय, ओईसीडी अर्थव्यवस्था के साथ नियम-आधारित साझेदारी को मजबूत बनाता है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अंधाधुंध सुरक्षावादी नीति से हटकर सावधानीपूर्वक उदारीकरण का रास्ता अपना रहा है। न्यूजीलैंड के लिए स्थिति राजनीतिक तौर पर अधिक संवेदनशील है। प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन इसे विकास के अवसर के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन डेयरी क्षेत्र को बाहर रखने से आलोचना तेज है, क्योंकि यह उसके कुल निर्यात का बड़ा हिस्सा है। आरोप है कि आव्रजन और सेवाओं में रियायतें देने के बावजूद माल व्यापार में लाभ सीमित हैं। संसद में मंज़ूरी की परीक्षा कठिन हो सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ा लाभ है- न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत निर्यात पर शून्य शुल्क। इससे विशेष रूप से श्रम-प्रधान और विनिर्माण क्षेत्र जैसे वस्त्र, जूते-चप्पल, इंजीनियरिंग सामान, दवाएं, रसायन और प्रोसेस्ड फूड को बढ़त मिल सकती है। सेवाओं के क्षेत्र में व्यापक बाजार पहुंच, फार्मा और मेडिकल डिवाइस के लिए तेज मंज़ूरी और वैश्विक मानकों की स्वीकृति, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करती है। निवेश और सेवाओं में भी नई संभावनाएं खुलती हैं- अगले 15 वर्षों में लगभग 20 बिलियन डॉलर तक निवेश की संभावनाएं बताई गई हैं, जिनसे अवसंरचना, कृषि-प्रौद्योगिकी, शिक्षा, नवाचार और हरित ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है।
भारत-न्यूजीलैंड एफटीए न तो क्रांतिकारी है और न ही मामूली। असली महत्व रणनीतिक स्थिति, सेवाओं के उदारीकरण और लोगों की आवाजाही में छिपा है। भारत के लिए यह संतुलित उदारीकरण का उदाहरण है, जबकि न्यूजीलैंड के लिए यह उभरती शक्ति के साथ शुरुआती साझेदारी का अवसर है- राजनीतिक जोखिमों के बावजूद। अब असली परीक्षा कार्यान्वयन की है। यदि सरकारें और निजी क्षेत्र मिलकर ठोस कदम उठाएं, तो यह समझौता भविष्य में भारत की पैसिफिक क्षेत्र की व्यापारिक रणनीति का मॉडल बन सकता है।