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म्युचुअल फंड और निवेश

अक्सर निवेश की अवधि के अनुपात में लाभ के दावे किए जाते हैं। लेकिन गारंटी कोई नहीं है, क्योंकि म्युचुअल फंड में मुनाफा आखिरकार शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर ही निर्भर करता है।

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Aug 01, 2018
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- मधुरेन्द्र सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार

निवेशकों के सामने इस समय यक्ष प्रश्न यह है कि वे अपना धन कहां लगाएं ताकि वह बढ़े। रियल एस्टेट में कोई दम बचा नहीं है तो शेयर बाजार उतार-चढ़ाव से भरे हुए हैं। बुरे समय का साथी सोना इस समय उन ऊंचाइयों पर जा पहुंचा है, जहां से उसके गिरने की ही आशंका है। फिक्स्ड डिपॉजिट की दरें भी आकर्षक नहीं रही हैं और परिवपक्वता के बाद उन पर टैक्स भी लगता है। ऐसे में बच जाता है म्युचुअल फंड, जिसका प्रचार जोर-शोर से हो रहा है। ‘म्युचुअल फंड सही है’, यह स्लोगन इन दिनों हर जगह दिखाई दे रहा है।

ज्यादातर लोग यह सोचकर म्युचुअल फंड में पैसा लगा देते हैं कि वाकई फंड मैनेजर ऐसे शेयरों या डेट फंड में उनका पैसा लगा रहे होंगे जिनसे उन्हें खूब फायदा होगा। म्युचुअल फंड सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआइपी) खातों में पूरे देश से लगभग 2.29 लाख करोड़ रुपए लगाए जा चुके हैं। अकेले जून महीने में 7,554 करोड़ रुपए जमा हुए। यह राशि बताती है कि म्युचुअल फंड में निवेश कितने बड़े पैमाने पर हो रहा है। भले ही निवेश के इस माध्यम की लोकप्रियता आसमान छू रही हो, लेकिन इस सच को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इसमें भी तमाम किस्म के जोखिम हैं और कई फंड घाटे में जा चुके हैं।

दरअसल भारत में निवेश का स्वरूप ही कुछ ऐसा है कि जब लोग निवेश करते हैं तो एक ही सेक्टर में लगातार करते चले जाते हैं। धुंआधार विज्ञापनों और निवेश के सीमित साधनों के कारण निवेशकों को निवेश का यह जरिया फायदे का सौदा लगने लगा। कमीशन के चलते निवेश सलाहकार भी लोगों को म्युचुअल फंड में निवेश के लिए प्रेरित करने लगे और म्युचुअल फंड इंडस्ट्री का दायरा बढ़ता गया।

अब आंकड़े कुछ और बता रहे हैं। एक रिसर्च के मुताबिक कई म्युचुअल फंड घाटे में तो चले ही गए हैं और कई आईपीओ बचाने के फेर में पडक़र अपना पैसा गंवा बैठे हैं। बिगड़े हुए हालात में ऐसे फंड मैनेजरों की निवेशकों को ललचाने की कोशिशों के कारण बाजार नियामक सेबी को भी कड़े कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा। म्युचुअल फंड कंपनियों ने ग्राहकों को ललचाने या यों कहें कि भ्रमित करने के लिए कई फंड पेश कर दिए। इससे बाजार में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।

पिछले दिनों एक गैर-सरकारी बैंक की सहायक कंपनी के आइपीओ को मझधार से निकालने के लिए जिस तरह से पचास से अधिक म्युचुअल फंड का पैसा उसमें लगाया गया और आइपीओ की कमजोर लिस्टिंग पर शेयर के घाटे में जाने के बाद म्युचुअल फंड हाउस उसे बेचकर निकले, निवेशकों को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ा।

एक ओर म्युचुअल फंड कंपनियों का दावा है कि वे सोच-समझकर ग्राहकों के पैसे का निवेश करती हैं तो दूसरी ओर यह सच कि वे अपनी जरूरतों और व्यापारिक संबंधों के लिए भी निवेश करते हैं। फंड हाउस निवेश के समय सब्जबाग तो दिखाते हैं लेकिन घाटा होने या वांछित लाभ न होने पर उनका जोर इस जानकारी पर होता है कि म्युचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा है। ऐसा उनके विज्ञापनों में भी बताया जाता है।

अगर म्युचुअल फंड कंपनियों के दावे सच होते तो बड़ी तादाद में फंड घाटे में नहीं चले जाते। असलियत यही है कि फंड मैनेजर भी गलत समय में गलत शेयरों को खरीदते हैं और बेचते हैं। इतना ही नहीं, कई बार उनके फैसले किसी अन्य वित्तीय संस्था को बचाने की खातिर लिए गए होते है जिसमें घाटे की पूरी गुंजाइश होती है। शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव को एकदम सही जान पाना किसी भी फंड मैनेजर के बस की बात नहीं है। शायद इसे ही ध्यान में रखते हुए कई फंड मैनेजरों ने शेयर बाजारों के सूचकांकों से आगे निकल जाने के दावों के साथ फंड जारी किए हैं। लेकिन ये फंड तो और भी जोखिम भरे हैं क्योंकि इनका ज्यादातर पैसा ‘स्मॉल कैप्स’ यानी छोटी कंपनियों के शेयरों में लगता है। ये शेयर जितनी तेजी से दोगुने होते हैं, उससे ज्यादा तेजी से आधे-चौथाई भी।

बैलेंस्ड फंड के बारे में कहा जाता है कि ये डेट फंड और शेयरों का मिश्रण है, शेयर और डेट एक साथ ऊपर-नीचे नहीं होते हैं और एक संतुलन बना रहता है। लेकिन पिछले दिनों देखा गया कि जब बाजार चढ़ रहा था तो डेट मार्केट भी चढ़ रहा था। ऐसे में बैलेंस्ड फंड की अवधारणा को ही धक्का लगता है। दूसरी बात, कितना पैसा शेयरों में लगाया जाएगा और कितना डेट में, यह फंड मैनेजर पर निर्भर करता है। हालांकि कुछ फंड में इसका खुलासा किया जाता है। यहां पर यह जानना जरूरी है कि जिस फंड में जितना ज्यादा शेयरों का अनुपात होगा, उसमें जोखिम उतना ही ज्यादा होगा।

अक्सर निवेशकों को बताया जाता है कि जितनी लंबी निवेश की अवधि, उतना ही अधिक लाभ। लेकिन इसकी गारंटी कोई नहीं है, क्योंकि म्युचुअल फंड में मुनाफा आखिरकार शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर ही निर्भर करता है। म्युचुअल फंड सही है या नहीं, इसका फैसला हर वह निवेशक कर सकता है जो फंड मैनेजर के निवेश का रुख और फंड के ट्रैक रिकॉर्ड के साथ न केवल जोखिम उठाने की अपनी क्षमता को जान लेता है बल्कि यह भी जान लेता है कि बाजार है तो अनिश्चितता है और अनिश्चितता है तो जोखिम है।

Published on:
01 Aug 2018 10:14 am