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साझेदारी का नया दौर

आज भारत जिस तरह भविष्य का सामना करने को तैयार खड़ा है, वही स्थिति यूके की भी है। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ छोडऩे का फैसला किया है, पर उसकी वैश्विक भूमिका और स्थिति पहले जैसी रहेगी।

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Sunil Sharma

Jul 31, 2018

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- अलेक्जेंडर इवान्स, राजनयिक, भारत में ब्रिटिश उप-उच्चायुक्त।

अगर 1950 के दशक में फेसबुक रहा होता तो भारत और ब्रिटेन के बीच आपसी रिश्ता ‘इट्स कॉम्प्लीकेटेड’ (जटिल) कहलाता। उस दौर में दोनों देशों के बीच हालांकि करीबी कामकाजी रिश्ता था, पर हकीकत यह थी कि भारत इसे आजादी के आंदोलन के आलोक में देखता था जबकि ब्रिटेन द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद साम्राज्योत्तर पहचान की तलाश में था।

पहली बार जब मैं 1992 में भारत आया तो देखा कि यह रिश्ता काफी आगे बढ़ चुका था। भारत ने तभी आर्थिक उदारीकरण की राह चुनी थी। यूके में रहने वाले प्रवासी भारतीय वहां काफी योगदान दे रहे थे और उन्होंने दोनों देशों के बीच के रिश्ते का कायाकल्प किया था। भारतीयों की उस पीढ़ी की, जिसके लिए अच्छे या बुरे का प्रस्थान बिंदु यूके था, जगह वह पीढ़ी ले रही थी जो अमरीकी टेलिविजन चाव से देखती थी और कैलिफोर्निया में आइटी क्षेत्र के उभार का हिस्सा बनना चाहती थी।

अगले 25 साल तक भारत से मेरा संबंध रहा। 1997 में एक छात्र के रूप में मैं दिल्ली आया। दिल्ली तेजी से बदल रही थी। तब वसंत कुंज उभार पर था और गुडग़ांव बॉलीवुड के सपने जैसा था। इसके बाद बार-बार भारत आना यहां आकर गुम हो जाने जैसा रहा। 21वीं सदी के पहले दशक की शुरुआत में भारत और बदला, उपभोक्तावाद बढ़ा, विकास हुआ, महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ीं और नीतिगत बहस ने अंतरराष्ट्रीय आयाम लिए। पहले जहां विदेशी अनुदान से संचालित मुट्ठी भर थिंक टैंक थे, वहीं अब नीतिगत मसलों पर काम करने वाला घरेलू समुदाय तैयार हो रहा था।

जब 2015 में मैं एक राजनयिक के बतौर यहां आया तो स्पष्ट था कि यूके-भारत के रिश्ते बदल चुके थे। यूके ने भारत के प्रति अपनी वचनबद्धता जताते हुए 2002 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन किया। पी-5 देशों में ऐसा करने वाला यूके पहला देश था। द्विपक्षीय व्यापार साल-दर-साल बढ़ता गया। (आज माल और सेवाओं को मिलाकर यह 18 अरब पौंड को पार कर चुका है।) सामरिक और सुरक्षा क्षेत्र में हमारे रिश्ते और गहरे हुए। हमने ईयू और यूएन में उन आतंकी समूहों को प्रतिबंधित कराने में अग्रणी भूमिका निभाई जो भारत को निशाना बना रहे थे। हमारे हॉक प्रशिक्षक, जेट 2008 से भारतीय वायुसेना के प्रशिक्षण का आधार बन गए और हमारा औद्योगिक सहयोग मेक इन इंडिया के प्रति वचनबद्धता से संचालित था।

भारत और ब्रिटेन के आला वैज्ञानिकों व विद्वानों को जोडऩे के लिए संयुक्त शोध कार्यक्रमों की शृंखला ईजाद की गई। इस बीच लंदन शहर भारत में निवेश के लिहाज से पूंजी जुटाने का एक केंद्र बन गया। हमारे बीच तकनीकी साझेदारी भी लगातार बढ़ रही है। डिजिटल इंडिया काफी प्रभावशाली है - और इस बात की तसदीक मैं निजी रूप से कर सकता हूं क्योंकि मेरी बेटी का जन्म प्रमाणपत्र जारी होने में केवल दस मिनट का वक्त लगा था। अप्रेल में प्रधानमंत्री मोदी और टेरेसा मे द्वारा घोषित नई प्रौद्योगिकीय साझेदारी से दोनों देशों के सबसे मेधावी और नवाचारी लोगों का साथ मिलकर काम करना और संभावनाओं व क्षमताओं के दायरे को और विस्तारित करना सुनिश्चित होगा।

प्रधानमंत्री मोदी के यूके के दो आधिकारिक दौरे और यूके की प्रधानमंत्री टेरेसा मे व पूर्व प्रधानमंत्री कैमरून के भारत दौरे ने दर्शाया है कि द्विपक्षीय संबंध कितनी दूरी तय कर चुके हैं। दोनों देशों के संबंधों में 1990 के दशक के बाद से आया नाटकीय बदलाव कम कर के नहीं आंका जा सकता। जैसा कि मैंने भारत में अकसर अपने संभाषणों में कहा है, 1947 में ही ब्रिटेन ने भारत को यह बताने का काम छोड़ दिया था कि उसे क्या करना है। आज दोनों बराबर साझेदार हैं। पिछले साल दोनों देशों के बीच 12 लाख यात्राएं हुईं और पांच लाख से ज्यादा ब्रिटिश वीजा जारी किए गए। भारत के लोगों को जितने टिअर 2 वर्क वीजा दिए गए, वे बाकी दुनिया को जारी वीजा से ज्यादा थे। आज बड़ी संख्या में भारत के छात्र यूके में पढ़ रहे हैं, पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी अधिक।

आज दुखी मन से जिस भारत से मैं विदा लेने की तैयारी में हूं, वह बदल चुका है। यह भारत आत्मविश्वास से भरा है, जहां युवा महत्त्वाकांक्षी और सक्रिय हैं। जिस दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्य सवालों के घेरे में हैं, वहां भारत का लोकतंत्र एक चमकदार उदाहरण पेश करता है। जलवायु परिवर्तन पर भारत का नेतृत्व उदाहरण पेश कर रहा है। आज भारत भविष्य का सामना करने को तैयार खड़ा है। यही स्थिति यूके की भी है। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ छोडऩे का फैसला किया है, पर हमारी वैश्विक भूमिका और स्थिति पहले जैसी रहेगी। हम व्यापार करने वाले, घूमने-फिरने वाले और लतीफे सुनाने वाले लोग हैं और ऐसे ही रहेंगे।

मैं एक आशावाद के साथ विदा ले रहा हूं। यूके और भारत को अगले 70 बरस एक ऐसे रिश्ते के साथ काम करते देखना चाहूंगा जो वाकई भविष्य के लिहाज से हो - साझा मूल्यों, साझा हितों और विश्व कल्याण के लिए साथ मिलकर काम करने की राजनीतिक प्रतिबद्धता वाला एक रिश्ता। मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षों में यूके और भारत की साझेदारी फलती-फूलती रहेगी। इसी विश्वास के साथ कहना चाहता हूं - ‘फिर मिलेंगे।’