
क्या भारत एक कल्याणकारी राज्य से 'कॉर्पोरेट कैपिटलिस्ट स्टेट' बनता जा रहा है? यह सवाल अभी शायद जल्दबाजी होगा, लेकिन यह पूछने का आधार जरूर बन रहा है कि क्या सार्वजनिक सेवाओं में बाजार और शुल्क आधारित व्यवस्था का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है? क्या सरकार की भूमिका नागरिकों को सस्ती और सार्वभौमिक सुविधाएं देने से बदलकर ऐसी व्यवस्था बनाने की ओर बढ़ रही है, जिसमें सेवाओं की कीमत चुकाना नागरिक की जिम्मेदारी बनती जा रही है? यह बहस किसी एक फैसले से पैदा नहीं हुई है। रेलवे से लेकर एयरपोर्ट तक, पब्लिक प्रॉपर्टीज के मोनेटाइजेशन से लेकर डिजिटल पेमेंट तक और स्वास्थ्य से लेकर बिजली वितरण तक, सरकार और निजी क्षेत्र की भूमिका के बीच की रेखा बदल रही है। इसे केवल निजीकरण कहना भी सही नहीं होगा, पर यह सवाल महत्वपूर्ण है कि इस बदलाव की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?
ताजा उदाहरण यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआइ) का है। 15 अक्टूबर से दो हजार रुपए से अधिक के कुछ पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआइ लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होगा। सामान्य श्रेणी में यह शुल्क 300 रुपए तक सीमित रहेगा। रेलवे, टेलीकॉम, इंश्योरेंस, फ्यूल जैसी कुछ श्रेणियों में दो हजार रुपए से अधिक के लेन-देन पर पांच रुपए का फ्लैट एमडीआर तय किया गया है। हालांकि, यह शुल्क सीधे ग्राहक से नहीं लिया जाएगा और पर्सन-टू-पर्सन यूपीआइ लेन-देन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। फिर सवाल यह है कि जब एक सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने और चलाने की लागत बढ़ती है तो उसका भुगतान किस मॉडल से होगा? क्या हर पब्लिक सर्विस को अंतत: किसी न किसी शुल्क के जरिये चलाना होगा? अगर शुल्क व्यापारी पर लगता है तो क्या उसका असर आगे चलकर वस्तुओं और सेवाओं की कीमत पर नहीं पड़ सकता?
यही वह बिंदु है, जहां कल्याणकारी राज्य और बाजार आधारित राज्य की बहस शुरू होती है। दरअसल, भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ी है। यह अपने आप में गलत नहीं है। निजी निवेश से पूंजी आती है, प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और कई सेवाओं की गुणवत्ता भी सुधर सकती है। समस्या तब पैदा होती है, जब ऐसी सेवाएं भी केवल भुगतान करने की क्षमता से जुडऩे लगें, जिनका सामाजिक महत्व बहुत अधिक है। नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (एनएमपी) इसका बड़ा उदाहरण है। पहली एनएमपी में वर्ष 2021-25 के दौरान लगभग 6 लाख करोड़ रुपए की प्रॉपर्टीज के मोनेटाइजेशन का अनुमान था। अब एनएमपी 2.0 के तहत 2026-2030 के बीच 16.72 लाख करोड़ रुपए की मोनेटाइजेशन क्षमता का अनुमान लगाया गया है, जिसमें 5.8 लाख करोड़ रुपए का निजी क्षेत्र का निवेश शामिल है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मोनेटाइजेशन का अर्थ हमेशा सरकारी संपत्ति बेच देना नहीं है। इसमें लंबे समय की लीज, कंसेशन व पीपीपी जैसे मॉडल भी शामिल होते हैं, यानी स्वामित्व सरकार के पास रह सकता है, पर उससे होने वाली आय व इस्तेमाल का ढांचा बदल जाता है। असली सवाल 'निजी हाथ' में जाने का ही नहीं, बल्कि नेशनल प्रॉपर्टी से मिलने वाली सुविधा की कीमत व उसकी पहुंच का है। रेलवे इसका संवेदनशील उदाहरण है। कोविड से पहले सीनियर सिटीजन को किराये में रियायत मिलती थी। पुरुष यात्रियों को चालीस प्रतिशत और महिला यात्रियों को पचास प्रतिशत तक की छूट थी। मार्च 2020 में यह रियायत बंद हुई और अब तक सामान्य रूप से बहाल नहीं की गई है।
एयरपोट्र्स के विकास में निजी निवेश ने एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बदला है, लेकिन इसके साथ यात्री शुल्क का सवाल भी जुड़ा है। कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी परीक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था में होती है। अस्पताल निजी हो या सरकारी, नागरिक के लिए बीमारी का खर्च सबसे बड़ा आर्थिक जोखिम बन सकता है। भारत में स्वास्थ्य पर जेब से होने वाला खर्च पिछले वर्षों में घटा है। वर्ष 2021-22 में भी निजी अस्पतालों का स्वास्थ्य खर्च में हिस्सा लगभग 26.96 प्रतिशत था और भारत के कुल स्वास्थ्य खर्च में आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च की हिस्सेदारी लगभग 47 प्रतिशत आंकी गई है। बैंकिंग में मिनिमम बैलेंस, एटीएम ट्रांजैक्शन, एसएमएस जैसी सेवाओं पर शुल्क वसूली की बहस होती रही है। इससे बड़ा सवाल सामने आता है, क्या बैंकिंग व्यवस्था को सार्वभौमिक बनाने के बाद उसकी छोटी-छोटी लागत भी नागरिक पर डालना उचित है? यूपीआइ शुल्क भी इसी बहस को आगे बढ़ाता है। अगर डिजिटल भुगतान अर्थव्यवस्था का बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर बन चुका है तो उसके संचालन की लागत कौन वहन करे- सरकार, बैंक, पेमेंट कंपनियां या व्यापारी? इसका कोई आसान उत्तर नहीं है पर यह तय करना जरूरी है कि लागत का अंतिम बोझ उपभोक्ता तक न पहुंचे।
भारत को शायद 'कॉर्पोरेट कैपिटलिस्ट स्टेट' कहने से पहले यह देखना होगा कि सरकार बाजार को कितना स्थान देती है। नागरिक के हित के लिए कितनी मजबूत नियामक तथा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था खड़ी करती है। आखिरकार किसी भी आर्थिक मॉडल की सफलता का पैमाना केवल जीडीपी, निवेश या निजी पूंजी नहीं हो सकता। असली कसौटी यह है कि एक सामान्य नागरिक को शिक्षा, इलाज आदि के लिए अपनी आय का कितना हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है। विकास तब ही कल्याणकारी कहलाएगा, जब बाजार बढ़े तो अवसर बढ़ें, लेकिन नागरिक की जेब पर अनिवार्य सेवाओं का बोझ लगातार न बढ़े। यही वह सीमा है, जहां से भारत के भविष्य के आर्थिक मॉडल पर असली बहस शुरू होती है।
(आर्थिक विशेषज्ञ)