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प्रसंगवश: छत्तीसगढ़ में ‘प्रशासनिक आतंकवाद’ है क्या?

जनप्रतिनिधियों व लोकसेवकों में टकराव से विकास प्रभावित। जनहित और प्रदेश के विकास में एकजुट होकर योगदान देने की जरूरत...
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Chhattisgarh

हाल ही में सत्तारूढ़ दल के दो वरिष्ठ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को विशेषाधिकार हनन का औपचारिक नोटिस सौंपा है। छत्तीसगढ़ के इन दोनों सांसदों के मुताबिक उन आला अफसरों का व्यवहार संसदीय प्रोटोकॉल के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैये को प्रदर्शित करता है। विशेषाधिकार हनन की ये शिकायत भारतीय प्रशासनिक सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ की गई है। शिकायत के मुताबिक ये अफसर जनप्रतिनिधियों के फोन का जवाब नहीं देते, आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराते और मनमाने ढंग से काम करते हैं। सांसदों का आरोप है कि इससे जनता के कार्य प्रभावित हो रहे हैं और विकास कार्यों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न हो रही है। यह बात तो सही है कि लोकतंत्र के तीन पायों (स्तंभों) में से अगर दो पायों में टकराव होगा तो जनहित और विकासकार्यों पर उसका बुरा असर होगा। हमारे लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि जहां सिर्फ जनप्रतिनिधि ही कोई कार्य अकेले नहीं कर सकते, वहीं ऐसा ही दायित्व और कर्तव्य प्रशासनिक अधिकारियों का भी है। गाहे-बगाहे यह देखने में आता है कि जनप्रतिनिधियों और आला अफसरों में उच्चता को लेकर टकराव हो जाता है। ये दोनों ही अपने अधिकारों को एक-दूसरे से ऊपर मानने लगते हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में अफसरशाही हावी है, ऐसी खबर नई है। अक्सर अफसरों के बेपरवाह-बेलगाम होने की खबरें सुर्खियां बनती रही हैं। अफसरों के इस रवैये को पूर्व कैबिनेट मंत्री स्व. दिलीप सिंह जूदेव ने तो 'प्रशासनिक आतंकवाद' तक बता दिया था। प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज कर रहे हैं तो क्या ये उन मतदाताओं का भी अपमान नहीं है, जिन्होंने उन्हें जनहित-लोकहित के कार्यों के लिए चुना है। शासन-प्रशासन के विशेषज्ञों के मुताबिक लोकसेवकों को संसदीय प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है। अब जरूरत है कि दोनों पक्ष अहं त्यागकर जनहित और प्रदेश के विकास में एकजुट होकर योगदान दें।-अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com