
किसी देश की पहचान केवल उसकी वर्तमान उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि उन संघर्षों और बलिदानों से भी बनती है, जिन्होंने उसकी सभ्यता, संस्कृति और स्वाभिमान को बचाए रखा। भारत का इतिहास ऐसे असंख्य वीरों और वीरांगनाओं की गाथाओं से भरा है, जिन्होंने अलग-अलग कालखंडों में आक्रमणों व चुनौतियों का सामना किया। विडंबना यह है कि इनमें से अनेक नायक अपने ही देश के बड़े हिस्से के लिए आज भी अपरिचित हैं। ऐसे में पाठ्यपुस्तकें इन विस्मृतियों को दूर करने और भारत की साझा ऐतिहासिक स्मृति को मजबूत करने का कारगर माध्यम बन सकती हैं।
एनसीईआरटी की कक्षा नौवीं की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक में मध्यकालीन भारत के इतिहास को इसी व्यापक दृष्टि से देखने का प्रयास दिखाई देता है। 'रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस (1000-1700 ईस्वी)' अध्याय में जाट, राजपूत और सिख समुदायों के प्रतिरोध, सिख गुरुओं की शहादत, महाराणा प्रताप की दिवेर युद्ध में वीरता के साथ रानी नायकी देवी और रानी अबक्का चौटा के शौर्य को भी स्थान दिया गया है। भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशालता इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में है, लेकिन यही विशालता कई बार इतिहास की जानकारी के क्षेत्रीय बंटवारे का कारण बन जाती है। उत्तर भारत में दक्षिण के नायकों की जानकारी सीमित रह जाती है और दक्षिण भारत में उत्तर के अनेक वीरों की। पश्चिम और पूर्व के बीच भी ऐसी दूरी दिखाई देती है। परिणाम यह होता है कि देश के अनेक महान व्यक्तित्व अपने ही देश के बड़े हिस्से के लिए अपरिचित रह जाते हैं। गुजरात की रानी नायकी देवी और कर्नाटक की रानी अबक्का चौटा का पाठ इसी दृष्टि से खास महत्व रखता है। ये केवल क्षेत्रीय इतिहास की नायिकाएं नहीं हैं, बल्कि भारतीय इतिहास में प्रतिरोध और साहस की व्यापक परंपरा की प्रतिनिधि हैं। इसी तरह महाराणा प्रताप का संघर्ष या सिख गुरुओं की शहादत केवल किसी एक क्षेत्र अथवा समुदाय तक सीमित घटनाएं नहीं हैं। इन्हें भारतीय इतिहास की साझा विरासत के रूप में समझना नई पीढ़ी को देश के विविध अतीत से जोड़ता है। नई पुस्तक में यूरोपीय क्रांति के अध्याय को हटाया गया है और भारतीय इतिहास के प्रतिरोध के इन प्रसंगों को जगह मिली है। पाठ्यक्रम में क्या शामिल हो और क्या नहीं, यह हमेशा गंभीर अकादमिक विमर्श का विषय होना चाहिए।
विश्व इतिहास का अध्ययन भी जरूरी है, क्योंकि उससे विद्यार्थी दुनिया में हुए राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक बदलावों को समझते हैं। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि भारतीय विद्यार्थी अपने देश के इतिहास और उसकी विविध परंपराओं से पर्याप्त परिचित हों। पाठ्यपुस्तक में हुए ये बदलाव इसी दिशा में एक अवसर हैं। जरूरत इस बात की है कि इतिहास की किताबें नई पीढ़ी को अतीत पर गर्व करना ही नहीं, उससे प्रश्न पूछना, उसे समझना और उससे सीखना भी सिखाएं।