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जनसंपर्क दिवस विशेष-स्वास्थ्य सेवाओं में टूटता संवाद-बिखरता विश्वास

 हमारे देश में स्वास्थ्य क्षेत्र में जनसंपर्क की अवधारणा आज भी कइयों के लिए अबूझ पहेली है और इसे लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है। भारत जैसे देश में, जहां केंद्र का स्वास्थ्य बजट कुल जीडीपी का मात्र लगभग दो प्रतिशत है, वहां भी करीब तीन-चौथाई आबादी केंद्रीय स्वास्थ्य बजट के लाभों से वंचित रह जाती है।

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Apr 20, 2026
government hospitals प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)

रंजन दास गुप्ता
वर्ष 1958 में प्रख्यात चिकित्सक डॉ. बी. सी. रॉय ने कहा था कि स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क संचार का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। अफसोस, भारत में इसकी अहमियत आज भी बहुत कम समझी गई है। हमारे देश में स्वास्थ्य क्षेत्र में जनसंपर्क की अवधारणा आज भी कइयों के लिए अबूझ पहेली है और इसे लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है। भारत जैसे देश में, जहां केंद्र का स्वास्थ्य बजट कुल जीडीपी का मात्र लगभग दो प्रतिशत है, वहां भी करीब तीन-चौथाई आबादी केंद्रीय स्वास्थ्य बजट के लाभों से वंचित रह जाती है।
यदि स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क पर सरसरी नजर डालें तो हम पाते हैं कि संबंधित पेशेवर अपने संस्थान की छवि को बेहतर बनाने के लिए मीडिया, सरकार और नियामक संस्थाओं के साथ संतुलित और सकारात्मक संबंध बनाए रखते हैं। लेकिन यह बात कॉरपोरेट अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और क्लीनिकों पर लागू होती है।
इसके विपरीत, सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर व्यवस्थित जनसंपर्क विभाग नहीं होते। वहां जनसंपर्क का दारोमदार अस्पताल प्रबंधन, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के व्यवहार और कार्यशैली पर ही टिका होता है। स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क का सबसे महत्वपूर्ण पहलू डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और मरीज के बीच बेहतर संबंध है।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों का दबाव निजी अस्पतालों की तुलना में कहीं अधिक होता है। सरकारी अस्पताल आम जनता के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं, क्योंकि आम आदमी महंगे कॉरपोरेट अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च वहन नहीं कर सकता, इसलिए उसके लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा हैं। जबकि, निजी अस्पताल मुख्यत: उच्च वर्ग पर निर्भर रहते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क का मूल आधार है- डॉक्टर और मरीज, दोनों ही एक-दूसरे की जरूरतों और सीमाओं को प्रभावी ढंग से समझें। इनके बीच किसी भी प्रकार की गलतफहमी अव्यवस्था, भ्रम और कभी-कभी हिंसा तक को जन्म देती है, जो किसी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। अच्छा व्यवहार, संवेदनशील समझ और कोई झूठे आश्वासन दिए बगैर उपचार का भरोसा दिलाना ही आदर्श जनसंपर्क है, जिसकी जरूरत भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को है। इसमें पैरामेडिकल स्टाफ की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
हाल के वर्षों में भारत में डॉक्टरों और इंटर्न पर हिंसा के मामले भयावह रूप से बढ़े हैं। अगस्त 2024 में कोलकाता में तीसरे वर्ष की मेडिकल इंटर्न अभया की जघन्य हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद, घटना के विरोध में पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पतालों में तीन महीने तक ओपीडी सेवाएं ठप रहीं, जिससे कई लोगों की जान गई।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का निर्देश दिया। चूंकि इस टास्क फोर्स ने डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की सुरक्षा के लिए किसी सख्त केंद्रीय कानून की अनुशंसा नहीं की, जिससे पूरे चिकित्सा में आज भी असंतोष है और वह अब भी ठोस कानून की मांग कर रहा है। हिंसा के विरोध में लगातार हड़तालें करना भी समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं है। इससे मरीज नियमित इलाज से वंचित हो जाते हैं, इसलिए यह भी चिकित्सा कर्मियों पर होने वाली हिंसा से कम बड़ा अपराध नहीं है। इस मामले में सीएमसी वेल्लौर एक मिसाल है, जिसने कभी हड़ताल या बंद का रास्ता नहीं अपनाया। यह स्वास्थ्य सेवाओं में उत्कृष्ट जनसंपर्क का आदर्श उदाहरण है, जहां मरीजों को सर्वोत्तम उपचार मिलता है। कोविड काल के बाद यहां आए एक अमेरिकी मरीज ने कहा था कि यह संस्थान पश्चिमी देशों के शीर्ष अस्पतालों के स्तर की सेवाएं देता है।
ऐसा नहीं है कि देश में अन्य अच्छे अस्पताल नहीं हैं। प्रीथा रेड्डी, डॉ. आरती मारिया और डॉ. आर. वी. अशोकन जैसे विशेषज्ञ अपने-अपने क्षेत्रों में मरीजों और समाज के साथ बेहतर संबंध बनाए रखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रख्यात सूक्ष्मजीव विज्ञानी डॉ. नंदिनी दुग्गल ने सही कहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क डॉक्टर और मरीज के बीच दो-तरफा संवाद है, जिससे दोनों पक्षों का लाभ होता है।
दुर्भाग्य से, स्वास्थ्य क्षेत्र में जनसंपर्क के लिए कोई स्पष्ट शैक्षणिक दिशा-निर्देश मौजूद नहीं हैं। इसे अनुभव, कार्य और सबसे बढक़र नैतिकता के माध्यम से सीखा और अपनाया जाता है। जैसे-जैसे एक और 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' करीब आ रहा है, भारत को अपनी स्वास्थ्य सेवाओं में जनसंपर्क को अधिक मानवीय, संवेदनशील और परिपक्व बनाने की आवश्यकता है, ताकि चिकित्सा सेवा सच में विश्वास और सहानुभूति का पर्याय बन सके।

Published on:
20 Apr 2026 05:15 pm
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