वे पाठक को ही पत्रिका का असली मालिक मानते थे और खुद को सिर्फ एक ट्रस्टी। पत्रिका के वितरकों या हॉकर्स को जिस तरह वे सम्मान के साथ बराबरी का दर्जा देते थे। ऐसी मिसाल मुश्किल से देखने को मिलती है।
हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी का मालपुरा के एक छोटे से गांव सोड़ा से शुरू हुआ सफर कुछ नहीं से, बहुत कुछ बनने की कहानी है। मुझे पत्रिका में तीन पीढ़ियों के साथ कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। पूज्य बाबूसा. के साथ जितना भी समय व्यतीत हुआ, उसमें उनके व्यक्तित्व की विशालता को करीब से देखा और समझा कि कोई व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंच कर किस तरह सहज और सरल बनकर रह सकता है। वे पाठक को ही पत्रिका का असली मालिक मानते थे और खुद को सिर्फ एक ट्रस्टी। पत्रिका के वितरकों या हॉकर्स को जिस तरह वे सम्मान के साथ बराबरी का दर्जा देते थे। ऐसी मिसाल मुश्किल से देखने को मिलती है।
कुलिश जी समय के बड़े पाबंद थे। कार्यक्रमों में किसी भी प्रकार की देरी उन्हें नहीं सुहाती थी। यहां तक कि पत्रिका के कार्यक्रम में अगर कोई अतिथि समय पर नहीं आया तो वे इंतजार किए बिना कार्यक्रम शुरू करा देते थे।
एक बार जब अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जयपुर में नायला ग्राम की यात्रा पर आए थे तो हमने एक विजुअल ग्राफिक्स बनाया, जिसमें ग्रामीण परिवेश में क्लिंटन ऊंट चराते हुए और एकतारा बजाते हुए दिखाई दे रहे थे। उस समय आज की तरह एआइ जैसी तकनीक नहीं होती थी। मॉर्फिंग तकनीक से चेहरे बदलने का काम होता था, जो काफी कठिन थी। बहरहाल विजुअल तैयार हुआ। मैंने उस पर एक शीर्षक लिखा और कोचर साहब को दिखाने के लिए उनके कमरे में पहुंचा। संयोग से कुलिश जी वहीं पास में बैठे थे। मेरे हाथ में कागज देखते ही बोले, क्या ले आए नाहटा जी। मैंने विजुअल उनके हाथ में थमा दिया। उन्होंने जैसे ही विजुअल देखा तो तुरंत ही कहा, अरे यह तो कमाल कर दिया। फिर अपनी जेब से कलम निकाली और नया शीर्षक लिखा, ‘क्लिंटन थारा तीन नाम, बिल, काफिल, मुकाबिल काम’। रात को संपादकीय के साथी राजेश जी का फोन आया कि विजुअल के साथ आपका नाम देना चाहते हैं। मैंने कहा कि बेहतर होगा कि केवल डिजाइनर का नाम दे दिया जाए। मगर बाबूसा. का आदेश था।
अगले दिन वह ग्राफिक पत्रिका के सभी संस्करणों में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ और उसके नीचे दोनों ही नाम प्रकाशित हुए। देशभर में उसकी प्रशंसा हुई। कर्मचारियों की प्रतिभा को पहचानना और उन्हें प्रोत्साहित करने का कोई भी अवसर कुलिश जी कभी नहीं छोड़ते थे। यही कारण है कि पत्रिका की गुणवत्ता का आज तक कोई समाचार पत्र मुकाबला नहीं कर सका।
मैं मूलत: एक विज्ञापन सर्जक होने के नाते कुलिश जी के संपर्क में रहता था। कुलिश जी का मानना था कि दुनिया में सबसे श्रेष्ठ सम्प्रेषक विज्ञापन सृजन करने वाले लोग होते हैं। उन्होंने देश की विज्ञापन एजेंसियों में काम कर रहे विज्ञापन सर्जकों से अपील की कि वे सामाजिक कुरीतियों, विसंगतियों पर समाज का ध्यान आकर्षित करने वाले विज्ञापन भी बनाएं। इसके लिए उन्होंने कंसंर्ड कम्युनिकेशन अवॉर्ड की घोषणा की, जिसमें हर साल ऐसे सर्वश्रेष्ठ विज्ञापन को प्रोत्साहन स्वरूप 5 लाख रुपए का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की। यह भी सुनिश्चित किया कि प्रथम 50 विज्ञापनों का पत्रिका में निशुल्क प्रकाशन किया जाए ताकि वे समाज में जागृति लाने का माध्यम बन सकें। कुलिश जी ने पत्रिका के परिशिष्टों में प्रकाशित होने वाली साहित्य सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ कहानी और कविता के लिए वार्षिक पुरस्कारों की शुरुआत की। यह परंपरा आज भी कायम है। मीडिया की जिम्मेदारी और चरित्र को लेकर उनकी ओर से दिए गए संस्कार आज सार्वजनिक जीवन में भी मुझे हमेशा प्रेरित करते हैं।
(लेखक पत्रिका से लंबे समय से संबद्ध हैं )