दूरदृष्टा कुलिश जी: 1 मार्च 1995 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित 'कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नहीं, हम सब शूद्र हैं' आलेख
कर्पूर चंद्र कुलिश जी का मानना था कि जातिप्रथा मूल रूप से आर्थिक और कर्म आधारित विभाजन से उत्पन्न हुई है। विभिन्न जातियां पारंपरिक पेशों, स्थानों या प्रभावशाली व्यक्तित्वों से मिलकर बनीं और उत्पादन, सेवा व वितरण को व्यवस्थित करती रहीं। वंशानुगत कौशल के कारण शिल्प और कार्य पीढ़ियों तक विकसित होते रहे। हालांकि समय के साथ इसे कुप्रथा मानकर आलोचना की गई।
कुलिश जी ने स्पष्ट कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी जातिप्रथा समाप्त नहीं हुई, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था से जुड़ी है। राजनीतिक स्वार्थ, अज्ञानता और गलत नीतियों के कारण इस व्यवस्था की शक्ति को समझने के बजाय इसे विवाद और वोटबैंक की राजनीति का साधन बना दिया गया।